श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 34

 
श्लोक
ततोऽतिहृष्टा: स्वकृतोऽकृतार्हणं
पुष्पै: सुगा अप्सरसश्च नर्तनै: ।
गीतै: सुरा वाद्यधराश्च वाद्यकै:
स्तवैश्च विप्रा जयनि:स्वनैर्गणा: ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; अति-हृष्टा:—अत्यन्त प्रसन्न; स्व-कृत:—अपना अपना कार्य; अकृत—पूरा किया; अर्हणम्—भगवान् की पूजा रूप में; पुष्पै:—नन्दन कानन में उगे फूलों की वर्षा से; सु-गा:—दैवी गायक; अप्सरस: च—देवलोक की नर्तकियाँ; नर्तनै:—नाच से; गीतै:—देवलोक के गीत गाने से; सुरा:—सारे देवता; वाद्य-धरा: च—तथा ढोल बजाने वाले; वाद्यकै:— बाजा बजा करके; स्तवै: च—तथा स्तुतियों द्वारा; विप्रा:—ब्राह्मणगण; जय-नि:स्वनै:—भगवान् की महिमा गायन से; गणा:—हर कोई ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् हर एक के प्रसन्न होने पर देवता लोग नन्दन कानन से फूल बरसाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगीं और गायन के लिए प्रसिद्ध गन्धर्वगण स्तुति गाने लगे। ढोलकिये दुन्दुभी बजाने लगे तथा ब्राह्मण वैदिक स्तुतियाँ करने लगे। इस प्रकार स्वर्ग तथा पृथ्वी दोनों पर हर व्यक्ति भगवान् की महिमा का गायन करते हुए अपना अपना कार्य करने लगा।
 
तात्पर्य
 हर एक का विशेष कार्य होता है। शास्त्रों ने निरूपित किया है कि हर व्यक्ति अपनी अपनी योग्यताओं के अनुसार भगवान् की महिमाओं का गायन करे। यदि आप गायक हैं, तो अच्छी तरह गा कर भगवान् का गुणगान करें। यदि आप संगीतज्ञ हैं, तो वाद्ययंत्रों द्वारा उनका गुणगान करें। स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरि तोषणम् (भागवत १.२.१३)। जीवन का साफल्य भगवान् को तुष्ट करने में है। इसलिए पृथ्वी से लेकर देवलोक तक हर व्यक्ति भगवान् का गुणगान करने में लगा हुआ है। सभी महान् सन्त-पुरुषों का यही निर्णय है कि मनुष्य जो भी योग्यताएँ अर्जित कर चुका है उनका उपयोग भगवान् का गुणगान करने में करे।
इदं हि पुंसस्तपस: श्रुतस्य वा स्विष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धिदत्तयो:।

अविच्युतोऽर्थ: कविभिर्निरूपितो यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनम् ॥

“विद्वान मुनियों ने निश्चित निष्कर्ष निकाला है कि ज्ञान, तप, वैदिक अध्ययन, यज्ञ, स्तुति तथा दान की उन्नति का अमोघ उद्देश्य भगवान् के गुणों का उत्तम श्लोकों में दिव्य वर्णन करना है।” (भागवत १.५.२२)। यही जीवन की सिद्धि है। मनुष्य को उसके अपने गुणों के अनुसार भगवान् के गुणगान करने की शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षा, तप या आधुनिक जगत में व्यापार, उद्योग, शिक्षा आदि—इन सबको भगवान् के गुणगान में लगाना चाहिए। तभी संसार का हर व्यक्ति सुखी हो सकेगा।

इसलिए कृष्ण अपनी दिव्य क्रीड़ाएँ प्रदर्शित करने हेतु आते हैं जिससे लोगों को हर तरह से उनका गुणगान करने का अवसर मिल सके। किन्तु भगवान् का गुणगान किस तरह किया जाय यह समझ पाना शोध का विषय है। ऐसा नहीं है कि ईश्वर के बिना हर बात समझी जा सके। इसकी निन्दा की जाती है।

भगवद्भक्तिहीनस्य जाति: शास्त्रं जपस्तप:।

अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं लोकरञ्जनम् ॥

(हरिभक्ति सुधोदय ३.११) भगवद्भक्ति अथवा भगवान् के गुणगान के बिना हमारे पास जो भी है, वह शव को सजाने के समान है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥