श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 35

 
श्लोक
तदद्भ‍ुतस्तोत्रसुवाद्यगीतिका-
जयादिनैकोत्सवमङ्गलस्वनान् ।
श्रुत्वा स्वधाम्नोऽन्त्यज आगतोऽचिराद्
द‍ृष्ट्वा महीशस्य जगाम विस्मयम् ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—उस (स्वर्गलोक में देवताओं द्वारा मनाया गया उत्सव); अद्भुत—विचित्र; स्तोत्र—स्तुति; सु-वाद्य—अच्छे अच्छे बाजे; गीतिका—दैवी गीत; जय-आदि—जयजयकार इत्यादि; न-एक-उत्सव—भगवान् के गुणगान के लिए ही उत्सव; मङ्गल-स्वनान्—हर एक के लिए शुभ दिव्य ध्वनियाँ; श्रुत्वा—ऐसी ध्वनि सुन कर; स्व-धाम्न:—अपने धाम से; अन्ति—पास ही; अज:—ब्रह्म; आगत:—वहाँ आ गये; अचिरात्—तुरन्त; दृष्ट्वा—देखकर; महि—गुणगान; ईशस्य—कृष्ण का; जगाम विस्मयम्—विस्मित हो गये ।.
 
अनुवाद
 
 जब भगवान् ब्रह्मा ने अपने लोक के निकट ही ऐसा अद्भुत उत्सव होते सुना, जिसके साथ साथ संगीत, गीत तथा जयजयकार हो रहा था, तो वे तुरन्त उस उत्सव को देखने चले आये। कृष्ण का ऐसा गुणगान देखकर वे अत्यन्त विस्मित थे।
 
तात्पर्य
 अन्ति का अर्थ है “निकट” जिससे सूचित होता है कि उच्च लोकों में भी ब्रह्मलोक के निकट
महर्लोक, जनलोक, तपोलोक इत्यादि में भी कृष्ण के गुणगान का उत्सव चल रहा था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥