श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 12: अघासुर का वध  »  श्लोक 38

 
श्लोक
नैतद् विचित्रं मनुजार्भमायिन:
परावराणां परमस्य वेधस: ।
अघोऽपि यत्स्पर्शनधौतपातक:
प्रापात्मसाम्यं त्वसतां सुदुर्लभम् ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; एतत्—यह; विचित्रम्—अद्भुत है; मनुज-अर्भ-मायिन:—कृष्ण के लिए जो नन्द तथा यशोदा पर दयालु होने के कारण उनके पुत्र रूप में प्रकट हुए; पर-अवराणाम्—समस्त कार्यों तथा कारणों का; परमस्य वेधस:—परम स्रष्टा का; अघ: अपि—अघासुर भी; यत्-स्पर्शन—जिनके स्पर्श मात्र से; धौत-पातक:—संसार के सारे कल्मषों से मुक्त हो गया; प्राप—प्राप्त किया; आत्म-साम्यम्—नारायण जैसा शरीर; तु—लेकिन; असताम् सुदुर्लभम्—जो कलुषित आत्माओं के लिए संभव नहीं है किन्तु भगवान् की दया से सबकुछ संभव हो सकता है ।.
 
अनुवाद
 
 कृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं। भौतिक जगत—उच्च तथा निम्न जगत—के कार्य- कारण आदि नियन्ता भगवान् द्वारा ही सृजित होते हैं। जब कृष्ण नन्द महाराज तथा यशोदा के पुत्र रूप में प्रकट हुए तो उन्होंने अपनी अहैतुकी कृपा से ऐसा किया। अत: उनके लिए अपने असीम ऐश्वर्य का प्रदर्शन कोई विचित्र बात न थी। हाँ, उन्होंने ऐसी महती कृपा प्रदर्शित की कि सर्वाधिक पापी दुष्ट अघासुर भी ऊपर उठ गया और उनके संगियों में से एक बन गया और उसने सारूप्य मुक्ति प्राप्त की जो वस्तुत: भौतिक कलुषों से युक्त पुरुषों के लिए प्राप्त कर पाना असम्भव है।
 
तात्पर्य
 प्रेम के प्रसंग में माया शब्द भी व्यवहृत किया जाता है। मायावश ही पिता अपने पुत्र से प्रेम करता है। अत: मायिन: शब्द सूचित करता है कि कृष्ण प्रेमवश नन्द महाराज के पुत्र रूप में प्रकट हुए और मानवी शिशु (मनुजार्भ ) का रूप धारण कर लिया। कृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं। वे कार्य-कारण के स्रष्टा हैं और परम नियन्ता हैं। उनके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। अत: अघासुर जैसे जीव को भी उन्होंने
सारूप्य मुक्ति प्रदान की। कृष्ण के लिए यह तनिक भी विचित्र नहीं है। कृष्ण को अपने संगियों के साथ साथ अघासुर के मुँह में प्रवेश करने में आनन्द आया। अत: जब अघासुर को उनकी इस क्रीड़ा का सान्निध्य जो आध्यात्मिक जगत में होता है, प्राप्त हुआ तो उसके सारे कल्मष धुल गये और कृष्ण की कृपा से उसे सारुप्य मुक्ति तथा विमुक्ति प्राप्त हुई। कृष्ण के लिए यह कोई अनोखी बात न थी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥