श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
साधु पृष्टं महाभाग त्वया भागवतोत्तम ।
यन्नूतनयसीशस्य श‍ृण्वन्नपि कथां मुहु: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—शुकदेव गोस्वामी ने कहा; साधु पृष्टम्—आपके प्रश्न से मैं सम्मानित हुआ हूँ; महा-भाग—परम भाग्यशाली व्यक्ति; त्वया—तुम्हारे द्वारा; भागवत-उत्तम—हे सर्वश्रेष्ठ भक्त; यत्—क्योंकि; नूतनयसि—तुम नया से नया कर रहे हो; ईशस्य—भगवान् के; शृण्वन् अपि—निरन्तर सुनते हुए भी; कथाम्—लीलाओं को; मुहु:—बारम्बार ।.
 
अनुवाद
 
 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे भक्त शिरोमणि, परम भाग्यशाली परीक्षित, तुमने बहुत सुन्दर प्रश्न किया है क्योंकि भगवान् की लीलाओं को निरन्तर सुनने पर भी तुम उनके कार्यों को नित्य नूतन रूप में अनुभव कर रहे हो।
 
तात्पर्य
 कृष्णभावनामृत में प्रौढ़ हुए बिना भगवान् की लीलाओं का निरन्तर श्रवण कर पाना कठिन है। नित्यं नवनवायमानम्—यद्यपि अग्रगण्य भक्त भगवान् के विषय में वर्षों तक निरन्तर श्रवण करते हैं किन्तु तो भी उन्हें ये कथाएँ नित्य नूतन लगती हैं। अतएव ऐसे भक्त भगवान् कृष्ण की लीलाओं का श्रवण करना त्याग नहीं सकते। प्रमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन सन्त: सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति।
सन्त: शब्द उस व्यक्ति के लिए आया है, जिसमें कृष्ण-प्रेम उत्पन्न हो चुका है। यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि (ब्रह्म-संहिता ५.३८)। इसीलिए परीक्षित महाराज को भागवतोत्तम कह कर सम्बोधित किया गया है क्योंकि भक्ति में अग्रसर हुए बिना अधिकाधिक श्रवण करने का आनन्द अनुभव नहीं हो सकता और कथाएँ नित्य नूतन नहीं लग सकतीं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥