श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 12

 
श्लोक
भारतैवं वत्सपेषु भुञ्जानेष्वच्युतात्मसु ।
वत्सास्त्वन्तर्वने दूरं विविशुस्तृणलोभिता: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
भारत—हे महाराज परीक्षित; एवम्—इस प्रकार (भोजन करते हुए); वत्स-पेषु—बछड़े चराने वाले बालकों के साथ; भुञ्जानेषु—भोजन करने में व्यस्त; अच्युत-आत्मसु—अच्युत अर्थात् कृष्ण के अभिन्न होने से; वत्सा:—बछड़े; तु—फिर भी; अन्त:-वने—गहन जंगल के भीतर; दूरम्—काफी दूर; विविशु:—घुस गये; तृण-लोभिता:—हरी घास से लुब्ध होकर ।.
 
अनुवाद
 
 हे महाराज परीक्षित, एक ओर जहाँ अपने हृदय में कृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी को न जानने वाले ग्वालबाल जंगल में भोजन करने में इस तरह व्यस्त थे वहीं दूसरी ओर बछड़े हरी घास से ललचाकर दूर घने जंगल में चरने निकल गये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥