श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 13

 
श्लोक
तान् द‍ृष्ट्वा भयसन्त्रस्तानूचे कृष्णोऽस्य भीभयम् ।
मित्राण्याशान्मा विरमतेहानेष्ये वत्सकानहम् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
तान्—उन दूर जा रहे बछड़ों को; दृष्ट्वा—देखकर; भय-सन्त्रस्तान्—उन ग्वालबालों को जो भय से क्षुब्ध थे कि गहन वन के भीतर बछड़ों पर कोई खूनी जानवर आक्रमण न कर दे; ऊचे—कृष्ण ने कहा; कृष्ण: अस्य भी-भयम्—कृष्ण, जो स्वयं सभी प्रकार के भय का भी भय हैं (कृष्ण के रहने पर कोई भय नहीं रहता); मित्राणि—हे मित्रो; आशात्—भोजन के आनन्द से; मा विरमत—मत रुको; इह—इस स्थान में; आनेष्ये—वापस लाये देता हूँ; वत्सकान्—बछड़ों को; अहम्—मैं ।.
 
अनुवाद
 
 जब कृष्ण ने देखा कि उनके ग्वालबाल मित्र डरे हुए हैं, तो भय के भी भीषण नियन्ता उन्होंने उनके भय को दूर करने के लिए कहा, “मित्रो, खाना मत बन्द करो। मैं स्वयं जाकर तुम्हारे बछड़ों को इसी स्थान में वापस लाये दे रहा हूँ।”
 
तात्पर्य
 कृष्ण की मैत्री होने पर भक्त को कोई भय नहीं रह जाता। कृष्ण परम नियन्ता हैं, यहाँ तक कि वे मृत्यु के भी नियन्ता हैं, जो इस जगत के लिए परम भय है। भयं द्वितीयाभिनिवेशत: स्यात् (भागवत ११.२.३७)। यह भय कृष्णभावनामृत के अभाव के कारण उदय होता है अन्यथा भय हो ही नहीं सकता। जिसने कृष्ण के चरणकमलों में शरण ले रखी है उसे इस भय-रूपी जगत में कुछ भी भयावह नहीं है।
भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद् विपदां न तेषाम्।

भवाम्बुधि: अर्थात् भय का भौतिक सागर परम नियन्ता की कृपा से आसानी से पार किया जा सकता है। इस भौतिक जगत में पग पग पर भय तथा विपदा है (पदं पदं यद् विपदाम् ) किन्तु जो लोग भगवान् कृष्ण के चरणकमलों में शरणागत हैं उनके लिए ऐसा नहीं है। ऐसे व्यक्ति इस भयावह जगत से मुक्त कर दिये जाते हैं—

समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत्पदं पुण्ययशो मुरारे:।

भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पंद पदं यद् विपदां न तेषाम् ॥

(भागवत १०.१४.५८) अतएव हर व्यक्ति को चाहिए कि निर्भीकता के स्रोत भगवान् की शरण ग्रहण करे और इस तरह सुरक्षित हो ले।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥