श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 14

 
श्लोक
इत्युक्त्वाद्रिदरीकुञ्जगह्वरेष्वात्मवत्सकान् ।
विचिन्वन्भगवान्कृष्ण: सपाणिकवलो ययौ ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
इति उक्त्वा—यह कह कर (कि मुझे बछड़े लाने दो); अद्रि-दरी-कुञ्ज-गह्वरेषु—पर्वतों, पर्वत की गुफाओं, झाडिय़ों तथा सँकरी जगहों में; आत्म-वत्सकान्—अपने मित्रों के बछड़ों को; विचिन्वन्—ढूँढ़ते हुए; भगवान्—भगवान्; कृष्ण:—कृष्ण; स-पाणि-कवल:—दही तथा चावल अपने हाथ में लिए; ययौ—चल पड़े ।.
 
अनुवाद
 
 कृष्ण ने कहा, “मुझे जाकर बछड़े ढूँढऩे दो। अपने आनन्द में खलल मत डालो।” फिर हाथ में दही तथा चावल लिए, भगवान् कृष्ण तुरन्त ही अपने मित्रों के बछड़ों को खोजने चल पड़े। वे अपने मित्रों को तुष्ट करने के लिए सारे पर्वतों, गुफाओं, झाडिय़ों तथा सँकरे मार्गों में खोजने लगे।
 
तात्पर्य
 वेद (श्वेताश्वतर उपनिषद ६.८) बलपूर्वक कहते हैं कि भगवान् को अपने लिए कुछ भी नहीं करना होता (न तस्य कार्यं करणं च विद्यते ) क्योंकि वे अपनी शक्तियों के द्वारा हर कार्य करते रहते हैं (परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते )। फिर भी हम यहाँ देखते हैं कि वे अपने मित्रों के बछड़ों को ढूँढऩे स्वयं जाते हैं। यह कृष्ण की अहैतुकी कृपा है। मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्—सारे
जगत और समस्त ब्रह्माण्ड के जितने भी कार्य हैं, वे उन्हीं के निर्देशन में उन्हीं की विभिन्न शक्तियों द्वारा सम्पन्न होते हैं। तो भी जब अपने मित्रों की रखवाली करने की आवश्यकता होती है वे उसे स्वयं करते हैं। कृष्ण ने अपने मित्रों को आश्वासन दिया, “डरो नहीं, मैं स्वयं तुम लोगों के बछड़ों को ढूँढऩे जा रहा हूँ।” यह कृष्ण की अहैतुकी कृपा थी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥