श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 16

 
श्लोक
ततो वत्सानद‍ृष्ट्वैत्य पुलिनेऽपि च वत्सपान् ।
उभावपि वने कृष्णो विचिकाय समन्तत: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; वत्सान्—बछड़ों को; अदृष्ट्वा—जंगल में न देख कर; एत्य—बाद में; पुलिने अपि—यमुना के तट में भी; च—भी; वत्सपान्—ग्वालबालों को; उभौ अपि—दोनों ही को (बछड़ों तथा बालकों को); वने—जंगल में; कृष्ण:—भगवान् कृष्ण ने; विचिकाय—सर्वत्र ढूँढ़ा; समन्तत:—इधर-उधर ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् जब कृष्ण बछड़ों को खोज न पाये तो वे यमुना के तट पर लौट आये किन्तु वहाँ भी उन्होंने ग्वालबालों को नहीं देखा। इस तरह वे बछड़ों तथा बालकों को ऐसे ढूँढऩे लगे, मानों उनकी समझ में न आ रहा हो कि यह क्या हो गया।
 
तात्पर्य
 कृष्ण तुरन्त समझ गये कि ब्रह्मा ही बालकों तथा बछड़ों को चुरा ले गये हैं किन्तु वे अबोध बालक की तरह उन्हें इधर-उधर ढूँढऩे लगे जिससे ब्रह्मा कृष्ण
की माया को न समझ सकें। यह सब नाटकीय ढंग से हुआ। नाटक का पात्र हर बात जानता रहता है किन्तु मंच पर वह इस तरह कार्य करता है कि लोग उसे समझ नहीं पाते।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥