श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 17

 
श्लोक
क्‍वाप्यद‍ृष्ट्वान्तर्विपिने वत्सान्पालांश्च विश्ववित् ।
सर्वं विधिकृतं कृष्ण: सहसावजगाम ह ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
क्व अपि—कहीं भी; अदृष्ट्वा—न देखकर; अन्त:-विपिने—जंगल के भीतर; वत्सान्—बछड़ों को; पालान् च—तथा उनकी रक्षा करने वाले ग्वालबालों को; विश्व-वित्—इस जगत में हो रही प्रत्येक बात को जानने वाले कृष्ण; सर्वम्—हर वस्तु को; विधि-कृतम्—ब्रह्मा द्वारा सम्पन्न; कृष्ण:—कृष्ण; सहसा—तुरन्त; अवजगाम ह—समझ गये ।.
 
अनुवाद
 
 जब कृष्ण बछड़ों तथा उनके पालक ग्वालबालकों को जंगल में कहीं भी ढूँढ़ न पाये तो वे तुरन्त समझ गये कि यह ब्रह्मा की ही करतूत है।
 
तात्पर्य
 यद्यपि कृष्ण विश्ववित्—सारे ब्रह्माण्ड में घटने वाली प्रत्येक बात को जानते हैं किन्तु उन्होंने अबोध बालक की तरह ब्रह्मा की करतूत के प्रति अनभिज्ञता प्रकट की, यद्यपि वे तुरन्त
ही जान गये थे कि यह सब ब्रह्मा की करनी-धरनी है। यह लीला ब्रह्मविमोहन कहलाती है। ब्रह्मा पहले से ही अबोध बालक कृष्ण की क्रीड़ाओं से मोहित थे और अब तो वे और भी अधिक मोहित हो गये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥