श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 18

 
श्लोक
तत: कृष्णो मुदं कर्तुं तन्मातृणां च कस्य च ।
उभयायितमात्मानं चक्रे विश्वकृदीश्वर: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; कृष्ण:—भगवान्; मुदम्—आनन्द; कर्तुम्—उत्पन्न करने के लिए; तत्-मातृणाम् च—ग्वालबालों तथा बछड़ों की माताओं के; कस्य च—तथा ब्रह्मा के (आनन्द के लिए); उभयायितम्—बछड़ों तथा बालकों, दोनों के रूप में विस्तार; आत्मानम्—स्वयं; चक्रे—किया; विश्व-कृत् ईश्वर:—सम्पूर्ण जगत के स्रष्टा होने के कारण उनके लिए यह कठिन न था ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् बह्मा को तथा बछड़ों एवं ग्वालबालों की माताओं को आनन्दित करने के लिए, समस्त ब्रह्माण्ड के स्रष्टा कृष्ण ने बछड़ों तथा बालकों के रूप में अपना विस्तार कर लिया।
 
तात्पर्य
 यद्यपि ब्रह्मा पहले ही माया में फँस चुके थे किन्तु वे ग्वालबालों को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहते थे। जब वे बालकों तथा बछड़ों को चुरा कर अपने घर पहुँचे तो कृष्ण ने ब्रह्मा के लिए तथा बालकों की माताओं के लिए दूसरा चमत्कार उत्पन्न कर दिया—उन्होंने
फिर से जंगल में भोजन-लीला स्थापित कर दी और उसी तरह बालकों को भोजन करते और बछड़ों को चरते प्रकट कर दिया। वेदों के अनुसार एकं बहुस्याम्—भगवान् अपने आपको असंख्य बछड़ों तथा बालकों में बदल सकते हैं जैसाकि ब्रह्मा को मोहित करने के लिए उन्होंने किया।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥