श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 20

 
श्लोक
स्वयमात्मात्मगोवत्सान् प्रतिवार्यात्मवत्सपै: ।
क्रीडन्नात्मविहारैश्च सर्वात्मा प्राविशद् व्रजम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
स्वयम् आत्मा—परमात्मा स्वरूप कृष्ण; आत्म-गो-वत्सान्—अपने ही स्वरूप बछड़ों में अपना विस्तार कर लिया; प्रतिवार्य आत्म-वत्सपै:—पुन: उन्होंने बछड़ों को चराने वाले ग्वालों में परिणत कर लिया; क्रीडन्—इस तरह उन लीलाओं में होने वाली हर वस्तु स्वयं बन गये; आत्म-विहारै: च—स्वयं ही अनेक प्रकार से आनन्द लेने लगे; सर्व-आत्मा—परमात्मा, कृष्ण; प्राविशत्—प्रविष्ट किया; व्रजम्—व्रजभूमि में जो महाराज नन्द तथा यशोदा की भूमि है ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह अपना विस्तार करने के बाद जिससे वे सभी बछड़ों तथा बालकों की तरह लगें और साथ ही उनके अगुवा भी लगें, कृष्ण ने अब अपने पिता नन्द महाराज की व्रजभूमि में इस तरह प्रवेश किया जिस तरह वे उन सबके साथ आनन्द मनाते हुए सामान्यतया किया करते थे।
 
तात्पर्य
 अपने संगी ग्वालबालों के साथ बछड़ों तथा गौवों की रखवाली करते हुए कृष्ण सामान्यतया जंगल तथा चरागाह में रहा करते थे। अब जबकि उस असली टोली को ब्रह्मा चुरा ले गये थे कृष्ण ने ही उन सबों का रूप धारण कर लिया था। इसे कोई भी, यहाँ तक कि बलदेव भी, नहीं जान पाये और वे अपना काम करते रहे। वे अपने मित्रों को काम करने के लिए आदेश देते जा रहे थे, वे बछड़ों पर नियंत्रण रख रहे थे और जब नई घास के लोभ में वे इधर-उधर चले जाते तो उन्हें जंगल में ढूँढऩे भी स्वयं जाते। वे ही बछड़े
और ग्वालबाल बने हुए थे। यह कृष्ण की अचिन्त्य शक्ति थी। श्रील जीव गोस्वामी ने कहा है—राधाकृष्णप्रणयविकृतिर्ह्लादिनी शक्तिरस्मात्। राधा और कृष्ण एक हैं। कृष्ण अपनी ह्लादिनी शक्ति का विस्तार करके राधारानी बन जाते हैं। वही ह्लादिनी शक्ति (आनन्दचिन्मयरस ) तब भी विस्तृत हुई जब वे स्वयं बछड़े तथा बालक बन गए और व्रजभूमि में आनन्द-मंगल मनाने लगे। यह सब योगमाया शक्ति द्वारा किया गया था। जो महामाया शक्ति के अधीन हैं उनके लिए यह अचिन्त्य है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥