श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 21

 
श्लोक
तत्तद्वत्सान्पृथङ्‌नीत्वा तत्तद्गोष्ठे निवेश्य स: ।
तत्तदात्माभवद् राजंस्तत्तत्सद्म प्रविष्टवान् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
तत्-तत्-वत्सान्—जिन जिन गायों के जो जो बछड़े थे, उन्हें; पृथक्—अलग अलग; नीत्वा—ले जाकर; तत्-तत्-गोष्ठे—उनकी अपनी अपनी गोशालाओं में; निवेश्य—भीतर करके; स:—कृष्ण ने; तत्-तत्-आत्मा—पहले जैसे विभिन्न व्यक्तियों के रूप में; अभवत्—अपना विस्तार कर लिया; राजन्—हे राजा परीक्षित; तत्-तत्-सद्म—उन उन घरों में; प्रविष्टवान्—घुस गये (इस तरह कृष्ण सर्वत्र थे) ।.
 
अनुवाद
 
 हे महाराज परीक्षित, जिन कृष्ण ने अपने को विभिन्न बछड़ों तथा भिन्न भिन्न ग्वालबालों में विभक्त कर लिया था वे अब बछड़ों के रूप में विभिन्न गोशालाओं में और फिर विभिन्न बालकों के रूपों में विभिन्न घरों में घुसे।
 
तात्पर्य
 कृष्ण के अनेकानेक मित्र थे जिनमें से श्रीदामा, सुदामा तथा सुबल प्रमुख थे। इस तरह कृष्ण
स्वयं श्रीदामा, सुदामा तथा सुबल बन कर उनके घरों में उनके ही बछड़ों समेत घुसे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥