श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 22

 
श्लोक
तन्मातरो वेणुरवत्वरोत्थिता
उत्थाप्य दोर्भि: परिरभ्य निर्भरम् ।
स्‍नेहस्‍नुतस्तन्यपय:सुधासवं
मत्वा परं ब्रह्म सुतानपाययन् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
तत्-मातर:—उन उन ग्वालबालों की माताएँ; वेणु-रव—ग्वालबालों द्वारा वंशी तथा बिगुल बजाये जाने की ध्वनि से; त्वर— तुरन्त; उत्थिता:—अपने गृहकार्यों को छोड़ कर उठ गईं; उत्थाप्य—तुरन्त अपने पुत्रों को उठाकर; दोर्भि:—दोनों बाँहों से; परिरभ्य—आलिंगन करके; निर्भरम्—किसी प्रकार का भार अनुभव किये बिना; स्नेह-स्नुत—प्रगाढ़ प्रेम से बहते हुए; स्तन्य पय:—अपने स्तन का दूध; सुधा-आसवम्—अमृतमय प्रेम की तरह सुस्वादु; मत्वा—मान कर; परम्—परम्; ब्रह्म—कृष्ण; सुतान् अपाययन्—अपने पुत्रों को पिलाया ।.
 
अनुवाद
 
 बालकों की माताओं ने अपने अपने पुत्रों की वंशियों तथा बिगुलों की ध्वनि सुन कर अपना अपना गृहकार्य छोड़ कर उन्हें गोदों में उठा लिया, दोनों बाँहों में भर कर उनका आलिंगन किया और प्रगाढ़ प्रेम के कारण, विशेष रूप से कृष्ण के प्रति प्रेम के कारण स्तनों से बह रहा दूध वे उन्हें पिलाने लगीं। वस्तुत: कृष्ण सर्वस्व हैं लेकिन उस समय अत्यधिक स्नेह व्यक्त करती हुईं वे परब्रह्म कृष्ण को दूध पिलाने में विशेष आनन्द का अनुभव करने लगीं और कृष्ण ने उन माताओं का क्रमश: दूध पिया मानो वह अमृतमय पेय हो।
 
तात्पर्य
 यद्यपि सारी वृद्धा गोपियाँ जानती थीं कि कृष्ण तो यशोदा के पुत्र हैं फिर भी उनकी अभिलाषा थी, “यदि कृष्ण मेरा पुत्र होता तो मैं भी यशोदा की तरह उसकी देख-भाल करती।” यही उनकी आन्तरिक इच्छा थी। इसीलिए उन्हें तुष्ट करने के लिए अब उनका पुत्र रूप धारण करके कृष्ण ने उनकी अभिलाषा
पूरी की। उन्होंने कृष्ण का आलिंगन करके तथा दूध पिलाकर कृष्ण के लिए अपने विशेष प्रेम को बढ़ाया और कृष्ण ने उनका स्तन-पान अमृतमय पेय के रूप में किया। इस तरह ब्रह्मा को मोहित करते हुए स्वयं उन्होंने अन्य माताओं तथा अपने बीच योगमाया द्वारा उत्पन्न दिव्य आनन्द का भोग किया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥