श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 24

 
श्लोक
गावस्ततो गोष्ठमुपेत्य सत्वरं
हुङ्कारघोषै: परिहूतसङ्गतान् ।
स्वकान् स्वकान् वत्सतरानपाययन्
मुहुर्लिहन्त्य: स्रवदौधसं पय: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
गाव:—बछड़े; तत:—तत्पश्चात्; गोष्ठम्—गोशालाओं में; उपेत्य—पहुँच कर; सत्वरम्—शीघ्र ही; हुङ्कार-घोषै:—रँभाती हुई; परिहूत-सङ्गतान्—गाएँ बुलाने के लिए; स्वकान् स्वकान्—अपनी अपनी माताओं को; वत्सतरान्—अपने अपने बछड़ों को; अपाययन्—पिलाती हुईं; मुहु:—बारम्बार; लिहन्त्य:—बछड़ों को चाटतीं; स्रवत् औधसम् पय:—उनके थनों से प्रचुर दूध बहता हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् सारी गौवें अपने अपने गोष्ठों में घुसतीं और अपने अपने बछड़ों को बुलाने के लिए जोर से रँभाने लगतीं। जब बछड़े आ जाते तो माताएँ उनके शरीरों को बारम्बार चाटतीं और उन्हें अपने थनों से बह रहा प्रचुर दूध पिलातीं।
 
तात्पर्य
 बछड़ों तथा उनकी माताओं के बीच के सारे
कार्यकलाप स्वयं कृष्ण चला रहे थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥