श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 25

 
श्लोक
गोगोपीनां मातृतास्मिन्नासीत्स्‍नेहर्धिकां विना ।
पुरोवदास्वपि हरेस्तोकता मायया विना ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
गो-गोपीनाम्—गौवों तथा गोपियों दोनों के लिए; मातृता—मातृ-स्नेह; अस्मिन्—कृष्ण के प्रति; आसीत्—सामान्यतया था; स्नेह—स्नेह की; ऋधिकाम्—वृद्धि; विना—रहित; पुर:-वत्—पहले की तरह; आसु—गौवों तथा गोपियों के बीच था; अपि—यद्यपि; हरे:—कृष्ण का; तोकता—मेरा पुत्र कृष्ण है; मायया विना—बिना माया के ।.
 
अनुवाद
 
 प्रारम्भ से ही गोपियों का कृष्ण के प्रति मातृवत स्नेह था। कृष्ण के प्रति उनका यह स्नेह अपने पुत्रों के प्रति स्नेह से भी अधिक था। इस तरह अपने स्नेह-प्रदर्शन में वे कृष्ण तथा अपने पुत्रों में भेद बरतती थीं किन्तु अब वह भेद दूर हो चुका था।
 
तात्पर्य
 अपने तथा पराये पुत्र के बीच भेद होना अस्वाभाविक नहीं है। अनेक वृद्धा महिलाएँ अन्यों के पुत्रों से मातृवत् स्नेह रखती हैं। किन्तु वे भी अपने तथा परायों में भेद बरतती हैं। किन्तु अब वृद्धा गोपिकाएँ अपने पुत्रों तथा कृष्ण में यह भेद नहीं बरत पाईं क्योंकि उनके पुत्रों को तो ब्रह्मा चुरा ले गये थे और कृष्ण ही उनके पुत्र बने हुए थे। अतएव अपने पुत्रों के लिए जो
अब कृष्ण स्वयं ही थे, यह अधिक स्नेह मोह के कारण था, जो ब्रह्मा जैसा ही था। पहले श्रीदामा, सुदामा, सुबल और कृष्ण के अन्य मित्रों की माताएँ एक-दूसरे के पुत्रों से ऐसा स्नेह नहीं करती थीं किन्तु अब गोपियाँ सारे बालकों को अपना ही पुत्र मान रही थीं। इसीलिए शुकदेव गोस्वामी स्नेह की इस वृद्धि को ब्रह्मा, गोपियों, गौवों इत्यादि के मोह के रूप में बतलाना चाहते थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥