श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 27

 
श्लोक
इत्थमात्मात्मनात्मानं वत्सपालमिषेण स: ।
पालयन् वत्सपो वर्षं चिक्रीडे वनगोष्ठयो: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
इत्थम्—इस प्रकार; आत्मा—परमात्मा, कृष्ण ने; आत्मना—अपने आप से; आत्मानम्—पुन: अपने को; वत्स-पाल-मिषेण— ग्वालों तथा बछड़ों के वेश में; स:—साक्षात् कृष्ण; पालयन्—पालन करते हुए; वत्स-प:—बछड़ों को चराते हुए; वर्षम्— लगातार एक वर्ष तक; चिक्रीडे—क्रीडाओं का आनन्द लिया; वन-गोष्ठयो:—वृन्दावन तथा जंगल दोनों में ही ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह अपने को ग्वालबालों तथा बछड़ों का समूह बना लेने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण अपने को उसी रूप में बनाये रहे। वे उसी प्रकार से वृन्दावन तथा जंगल दोनों ही जगहों में एक वर्ष तक अपनी लीलाएँ करते रहे।
 
तात्पर्य
 जो कुछ था वह कृष्ण था। बछड़े, ग्वालबाल तथा उनके पालक स्वयं सभी कृष्ण थे। दूसरे शब्दों में, कृष्ण ने अपना विस्तार नाना प्रकार के बछड़ों तथा ग्वालबालों में कर लिया था और एक वर्ष तक वे अनवरत अपनी क्रीडाएँ करते रहे। भगवद्गीता
में कहा गया है कि कृष्ण का विस्तार (अंश) हर एक के हृदय में परमात्मा रूप में विद्यमान है। इसी तरह अपने को परमात्मा रूप में विस्तार न देकर उन्होंने बछड़ों तथा ग्वालबालों के अंश रूप में लगातार एक वर्ष के लिए विस्तार कर लिया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥