श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 30

 
श्लोक
द‍ृष्ट्वाथ तत्स्‍नेहवशोऽस्मृतात्मा
स गोव्रजोऽत्यात्मपदुर्गमार्ग: ।
द्विपात्ककुद्ग्रीव उदास्यपुच्छो-
ऽगाद्धुङ्कृतैरास्रुपया जवेन ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
दृष्ट्वा—देख कर; अथ—तत्पश्चात्; तत्-स्नेह-वश:—अपने बछड़ों के लिए बढ़े हुए स्नेह के कारण; अस्मृत-आत्मा—मानों अपने आप को भूल गईं; स:—वह; गो-व्रज:—गौवों का समूह; अति-आत्म-प-दुर्ग-मार्ग:—मार्ग के अत्यन्त दुर्गम होते हुए भी बछड़ों के लिए अति स्नेह के कारण चराने वालों से बिछड़ कर दूर निकल आईं; द्वि-पात्—पैरों की जोड़ी; ककुत्-ग्रीव:— उनकी गर्दन के साथ ही उनके डिल्ले (कूबड़) हिल रहे थे; उदास्य-पुच्छ:—अपने सिर तथा पूछें उठाये; अगात्—आईं; हुङ्कृतै:—हुंकार करती; आस्रु-पया:—उनके थनों से दूध बह रहा था; जवेन—बलपूर्वक ।.
 
अनुवाद
 
 जब गायों ने गोवर्धन पर्वत की चोटी से अपने अपने बछड़ों को देखा तो वे अधिक स्नेहवश अपने आप को तथा अपने चराने वालों को भूल गईं और दुर्गम मार्ग होते हुए भी वे अपने बछड़ों की ओर अतीव चिन्तित होकर दौीं मानो वे दो ही पाँवों से दौड़ रही हों। उनके थन दूध से भरे थे और उनमें से दूध बह रहा था, उनके सिर तथा पूछें उठी हुई थीं और उनके डिल्ले (कूबड़) उनकी गर्दन के साथ साथ हिल रहे थे। वे तब तक तेजी से दौड़ती रहीं जब तक वे अपने बच्चों के पास दूध पिलाने पहुँच नहीं गईं।
 
तात्पर्य
 सामान्यतया गाय तथा बछड़े अलग-अलग चराये जाते हैं। बड़े लोग गौवों की रखवाली करते हैं और छोटे लडक़े बछड़ों की। किन्तु इस बार गौवों ने ज्योंही गोवर्धन पर्वत के
नीचे अपने बछड़ों को देखा वे अपनी स्थिति भूल गईं और तेजी से अपनी पूँछ उठाये, अगले तथा पिछले पैर जोड़े दौड़ती रहीं जब तक वे अपने बछड़ों के पास पहुँच नहीं गईं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥