श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 33

 
श्लोक
तदीक्षणोत्प्रेमरसाप्लुताशया
जातानुरागा गतमन्यवोऽर्भकान् ।
उदुह्य दोर्भि: परिरभ्य मूर्धनि
घ्राणैरवापु: परमां मुदं ते ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
तत्-ईक्षण-उत्प्रेम-रस-आप्लुत-आशया:—ग्वालों के सारे विचार अपने पुत्रों को देख कर उठने वाले वात्सल्य-प्रेम में लीन हो गये; जात-अनुरागा:—अत्यधिक आकर्षण का अनुभव करते हुए; गत-मन्यव:—क्रोध दूर हो जाने से; अर्भकान्—अपने पुत्रों को; उदुह्य—उठाकर; दोर्भि:—अपनी बाँहों से; परिरभ्य—आलिंगन करके; मूर्धनि—सिर पर; घ्राणै:—सूँघ कर; अवापु:— प्राप्त किया; परमाम्—सर्वोच्च; मुदम्—आनन्द; ते—उन ग्वालों ने ।.
 
अनुवाद
 
 उस समय ग्वालों के सारे विचार अपने अपने पुत्रों को देखने से उत्पन्न वात्सल्य-प्रेम रस में विलीन हो गये। अत्यधिक आकर्षण का अनुभव करने से उनका क्रोध छू-मन्तर हो गया। उन्होंने अपने पुत्रों को उठाकर बाँहों में भर कर आलिंगन किया और उनके सिरों को सूँघ कर सर्वोच्च आनन्द प्राप्त किया।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा द्वारा असली ग्वालबालों तथा बछड़ों के चुरा लिए जाने के बाद कृष्ण अपना विस्तार करके स्वयं ग्वालबाल तथा बछड़े बन गये थे। क्योंकि बालक वस्तुत: कृष्ण के अंश थे, इसलिए ग्वाले इन बच्चों के प्रति
अत्यधिक आकृष्ट हुए। पहले ये ग्वाले जब पर्वत की चोटी पर थे तो अत्यन्त क्रुद्ध थे। किन्तु कृष्ण होने के कारण उनके बालक अत्यधिक आकर्षक थे इसलिए विशेष प्रेमवश ग्वाले तुरन्त ही पर्वत से नीचे उतर आये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥