श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 35

 
श्लोक
व्रजस्य राम: प्रेमर्धेर्वीक्ष्यौत्कण्ठ्यमनुक्षणम् ।
मुक्तस्तनेष्वपत्येष्वप्यहेतुविदचिन्तयत् ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
व्रजस्य—गायों के झुंड का; राम:—बलराम; प्रेम-ऋधे:—स्नेह बढऩे के कारण; वीक्ष्य—देख कर; औत्-कण्ठ्यम्—अनुरक्ति; अनु-क्षणम्—निरन्तर; मुक्त-स्तनेषु—बड़े हो जाने के कारण अपनी माताओं का स्तन-पान छोड़ चुके थे; अपत्येषु—उन बछड़ों को; अपि—भी; अहेतु-वित्—कारण न समझने से; अचिन्तयत्—इस प्रकार सोचने लगे ।.
 
अनुवाद
 
 स्नेहाधिक्य के कारण गौवों को उन बछड़ों से भी निरन्तर अनुराग था, जो बड़े होने के कारण उनका दूध पीना छोड़ चुके थे। जब बलदेव ने यह अनुराग देखा तो इसका कारण उनकी समझ में नहीं आया अत: वे इस प्रकार सोचने लगे।
 
तात्पर्य
 कुछ गायों के छोटे बछड़े थे, जो उनका दूध पीना शुरू कर चुके थे और कुछ ने अभी अभी बच्चे दिये थे किन्तु प्रेमवश गौवें भावावेश में आकर उन पुराने बछड़ों के प्रति भी स्नेह प्रदर्शित करने लगीं जिन्होंने दूध पीना छोड़ रखा था। ये बछड़े बड़े हो चुके थे किन्तु फिर भी माताएँ उन्हें दूध पिलाना चाह रही थीं। इसलिए बलराम को कुछ-कुछ आश्चर्य हुआ और उन्होंने कृष्ण से उनके इस व्यवहार का कारण पूछना चाहा। गौवें नए बछड़ों के उपस्थित होते हुए भी, अपने बड़े बछड़ों को दूध पिलाने के लिए अधिक उत्सुक थीं क्योंकि पुराने बछड़े कृष्ण के अंश थे। ये आश्चर्यजनक घटनाएँ योगमाया के प्रबन्ध
से हो रही थीं। कृष्ण के निर्देशन में दो तरह की मायाएँ कार्य करती हैं—महामाया जो भौतिक जगत की शक्ति है तथा योगमाया जो आध्यात्मिक जगत की शक्ति है। ये असामान्य घटनाएँ योगमाया के प्रभाव से घट रही थीं। जिस दिन से ब्रह्मा ने बछड़ों तथा ग्वालबालों को चुराया था उसी दिन से योगमाया इस तरह कार्य कर रही थी कि वृन्दावन के वासी, जिसमें भगवान् बलराम भी सम्मिलित थे, यह नहीं समझ पाये कि योगमाया किस तरह से इन असामान्य घटनाओं को घटित कर रही है। किन्तु ज्यों ज्यों योगमाया धीरे धीरे कार्य करने लगी, तो विशेषकर बलराम समझ गये कि क्या हो रहा है अतएव उन्होंने कृष्ण से पूछा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥