श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 36

 
श्लोक
किमेतदद्भ‍ुतमिव वासुदेवेऽखिलात्मनि ।
व्रजस्य सात्मनस्तोकेष्वपूर्वं प्रेम वर्धते ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
किम्—क्या; एतत्—यह; अद्भुतम्—अद्भुत; इव—जैसा; वासुदेवे—वासुदेव कृष्ण में; अखिल-आत्मनि—सारे जीवों के परमात्मा; व्रजस्य—सारे व्रजवासियों का; स-आत्मन:—मेरे समेत; तोकेषु—इन बालकों में; अपूर्वम्—अपूर्व; प्रेम—प्रेम; वर्धते—बढ़ रहा है ।.
 
अनुवाद
 
 यह विचित्र घटना क्या है? सभी व्रजवासियों का, मुझ समेत. इन बालकों तथा बछड़ों के प्रति अपूर्व प्रेम उसी तरह बढ़ रहा है, जिस तरह सब जीवों के परमात्मा भगवान् कृष्ण के प्रति हमारा प्रेम बढ़ता है।
 
तात्पर्य
 प्रेम की यह वृद्धि माया नहीं थी। चूँकि कृष्ण ने अपना विस्तार प्रत्येक वस्तु के रूप में कर लिया था तथा वृन्दावन के हर वासी का संपूर्ण जीवन कृष्ण के निमित्त था, सारी गौवें कृष्ण-प्रेम के कारण नये बछड़ों की अपेक्षा पुराने बछड़ों में अधिक स्नेह दिखा रही थीं। इसी तरह पुरुष अपने पुत्रों के प्रति स्नेह में वृद्धि
कर रहे थे। वृन्दावन के सारे वासियों में अपने अपने बच्चों के प्रति कृष्ण जैसा ही प्रेम देख कर बलराम चकित थे। इसी तरह गौवें अपने अपने बछड़ों के प्रति उतनी ही स्नेहिल हो उठी थीं जितनी कृष्ण के प्रति थीं। योगमाया का कार्य देख कर बलराम चकित थे। इसीलिए उन्होंने कृष्ण से पूछा, “यह क्या हो रहा है? यह रहस्य क्या है?”
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥