श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 37

 
श्लोक
केयं वा कुत आयाता दैवी वा नार्युतासुरी ।
प्रायो मायास्तु मे भर्तुर्नान्या मेऽपि विमोहिनी ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
का—कौन; इयम्—यह; वा—अथवा; कुत:—कहाँ से; आयाता—आयी है; दैवी—देवी; वा—अथवा; नारी—स्त्री; उत— अथवा; आसुरी—राक्षसी; प्राय:—अधिकांशत:; माया—माया; अस्तु—हो सकती है; मे—मेरे; भर्तु:—प्रभु, कृष्ण के; न— नहीं; अन्या—कोई दूसरा; मे—मेरा; अपि—निश्चित रूप से; विमोहिनी—मोहग्रस्त करने वाली ।.
 
अनुवाद
 
 यह योगशक्ति कौन है और वह कहाँ से आई है? क्या वह देवी है या कोई राक्षसी है? अवश्य ही वह मेरे प्रभु कृष्ण की माया होगी क्योंकि उसके अतिरिक्त मुझे और कौन मोह सकता है?
 
तात्पर्य
 बलराम चकित थे। उन्होंने सोचा कि प्रेम का यह असाधारण प्रदर्शन या तो देवताओं की या किसी अद्भुत व्यक्ति की माया है। अन्यथा ऐसा परिवर्तन कैसे होता? उन्होंने सोचा, “यह माया कोई राक्षसी माया हो सकती है किन्तु वह मुझे कैसे वशीभूत कर सकती है? ऐसा सम्भव नहीं। अत: यह अवश्य
ही कृष्ण की माया है।” इसलिए उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह कृष्ण द्वारा उत्पन्न है, जिसे वे अपना आराध्यदेव मानते थे। उन्होंने सोचा, “यह कृष्ण की करनी है और मैं भी इसकी योगशक्ति को रोक नहीं पाया।” इस तरह बलराम समझ गये कि सारे लडक़े तथा बछड़े कृष्ण के ही अंश हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥