श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 38

 
श्लोक
इति सञ्चिन्त्य दाशार्हो वत्सान्सवयसानपि ।
सर्वानाचष्ट वैकुण्ठं चक्षुषा वयुनेन स: ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
इति सञ्चिन्त्य—इस प्रकार सोच कर; दाशार्ह:—बलदेव ने; वत्सान्—बछड़ों को; स-वयसान्—अपने साथियों समेत; अपि— भी; सर्वान्—सारे; आचष्ट—देखा; वैकुण्ठम्—केवल श्रीकृष्ण रूप में; चक्षुषा वयुनेन—दिव्य ज्ञान के चक्षुओं द्वारा; स:— उसने (बलदेव ने) ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार सोचते हुए बलराम अपने दिव्य ज्ञान के चक्षुओं से देख सके कि ये सारे बछड़े तथा कृष्ण के साथी श्रीकृष्ण के ही अंश हैं।
 
तात्पर्य
 हर व्यक्ति भिन्न होता है। यहाँ तक कि जुड़वों में भी भेद होता है। फिर भी जब कृष्ण ने अपना विस्तार बालकों तथा बछड़ों के रूप में किया, तो हर बालक तथा हर बछड़ा अपने
मूल रूप में प्रकट हुआ और हर एक में अपनी अपनी वही चाल-ढाल, वही रंग, वेश इत्यादि था क्योंकि कृष्ण इन सारे भेदों के साथ प्रकट हुए थे। यही कृष्ण का ऐश्वर्य था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥