श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 43

 
श्लोक
एवमेतेषु भेदेषु चिरं ध्यात्वा स आत्मभू: ।
सत्या: के कतरे नेति ज्ञातुं नेष्टे कथञ्चन ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस तरह; एतेषु भेदेषु—इन बालकों के बीच, जो पृथक् विद्यमान हैं; चिरम्—दीर्घकाल तक; ध्यात्वा—सोच कर; स:—वह; आत्म-भू:—ब्रह्मा; सत्या:—असली; के—कौन; कतरे—कौन; न—नहीं हैं; इति—इस प्रकार; ज्ञातुम्—जानने के लिए; न—नहीं; इष्टे—समर्थ था; कथञ्चन—किसी भी तरह से ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह दीर्घकाल तक विचार करते करते भगवान् ब्रह्मा ने उन दो प्रकार के बालकों में अन्तर जानने का प्रयास किया जो एक-दूसरे से पृथक् रह रहे थे। वे यह जानने का प्रयास करते रहे कि कौन असली है और कौन नकली है किन्तु वे कुछ भी नहीं समझ पाये।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा किंकर्तव्यविमूढ़ थे। उन्होंने सोचा, “असली लडक़े तथा बछड़े तो वैसे ही सो रहे हैं जिस तरह मैंने उन्हें रखा था किन्तु कृष्ण के साथ यहाँ दूसरा समूह खेल रहा है। यह कैसे हुआ?” ब्रह्मा समझ नहीं पाये कि क्या हो रहा है। कौन से बालक असली हैं और कौन से नकली हैं? ब्रह्मा किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहे थे। वे इस विषय पर दीर्घकाल तक मनन करते रहे— “बछड़ों तथा बालकों के एक ही समय दो समूह कैसे हो सकते हैं? क्या कृष्ण ने इन बालकों तथा बछड़ों को उत्पन्न किया है? या
जो सोये हुए हैं उन्हें कृष्ण ने उत्पन्न किया है? या दोनों ही कृष्ण की सृष्टियाँ हैं?” ब्रह्मा ने इस विषय पर कई प्रकार से सोचा। “यदि मैं गुफा जाकर यह देखूँ कि बालक तथा बछड़े वहाँ अब भी हैं, तो क्या कृष्ण वहाँ जाकर उन सबों को यहाँ लाकर रख देंगे जिससे मैं उन्हें यहाँ देख सकूँ और पुन: उन्हें यहाँ से वहाँ रख आयेंगे?” ब्रह्मा यह पता नहीं लगा पाये कि एक-जैसे बालकों तथा बछड़ों के एक ही साथ दो समूह कैसे सम्भव हैं। यद्यपि वे सोचते रहे, सोचते रहे किन्तु वे कुछ भी न समझ पाये।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥