श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 45

 
श्लोक
तम्यां तमोवन्नैहारं खद्योतार्चिरिवाहनि ।
महतीतरमायैश्यं निहन्त्यात्मनि युञ्जत: ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
तम्याम्—अँधेरी रात में; तम:-वत्—अंधकार के समान; नैहारम्—बर्फ से उत्पन्न; खद्योत-अर्चि:—जुगनू का प्रकाश; इव— सदृश; अहनि—दिन के समय, सूर्य-प्रकाश में; महति—महापुरुष में; इतर-माया—अपरा शक्ति; ऐश्यम्—सामर्थ्य; निहन्ति— नष्ट करती है; आत्मनि—अपने को; युञ्जत:—प्रयोग करने वाले व्यक्ति को ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह अँधेरी रात में बर्फ का अँधेरा तथा दिन के समय जुगनू के प्रकाश का कोई महत्व नहीं होता, उसी तरह निकृष्ट व्यक्ति की योगशक्ति महान् शक्तिशाली व्यक्ति के विरुद्ध प्रयोग किये जाने पर कुछ भी नहीं कर पाती, उलटे उस निकृष्ट व्यक्ति की शक्ति कम हो जाती है।
 
तात्पर्य
 जब कोई व्यक्ति अपने से श्रेष्ठ शक्तिशाली को पछाडऩा चाहता है, तो उस निकृष्ट की अपनी शक्ति उपहासास्पद बन जाती है। जिस तरह दिन में जुगनू तथा रात में बर्फ का कोई मूल्य नहीं होता, उसी तरह कृष्ण के सामने ब्रह्मा की योगशक्ति व्यर्थ हो गई क्योंकि महान् योगशक्ति क्षुद्र योगशक्ति को व्यर्थ कर देती है। अँधेरी रात में बर्फ से उत्पन्न अँधेरे का कोई अर्थ नहीं होता। रात में
तो जुगनू अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहता है किन्तु दिन में उसके प्रकाश का कोई मूल्य नहीं रहता—इसका रहा सहा मूल्य भी जाता रहता है। उसी तरह कृष्ण की योगशक्ति के समक्ष ब्रह्मा प्रभावहीन हो गये। कृष्ण की माया का तो महत्त्व नहीं घटा किन्तु ब्रह्मा की माया उपहासास्पद बन गई। इसलिए महान् शक्ति के समक्ष अपना क्षुद्र ऐश्वर्य प्रदर्शित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥