श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 49

 
श्लोक
आङ्‍‍घ्रिमस्तकमापूर्णास्तुलसीनवदामभि: ।
कोमलै: सर्वगात्रेषु भूरिपुण्यवदर्पितै: ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
आ-अङ्घ्रि-मस्तकम्—पाँव से लेकर सिर तक; आपूर्णा:—पूरी तरह सजा; तुलसी-नव-दामभि:—तुलसी की ताजी पत्तियों से बने हारों से; कोमलै:—कोमल; सर्व-गात्रेषु—पूरे शरीर में; भूरि-पुण्यवत्-अर्पितै:—पुण्यकर्मों में लगे भक्तों द्वारा अर्पित किये गये ।.
 
अनुवाद
 
 पाँव से लेकर सिर तक उनके शरीर के सारे अंग तुलसी दल से बने ताजे मुलायम हारों से पूरी तरह सज्जित थे जिन्हें पुण्यकर्मों (श्रवण तथा कीर्तन) द्वारा भगवान् की पूजा में लगे भक्तों ने अर्पित किया था।
 
तात्पर्य
 भूरि-पुण्यवद्-अर्पितै—यह इस श्लोक का महत्त्वपूर्ण पद है। विष्णु के इन रूपों की पूजा उन भक्तों द्वारा की गई थी जिन्होंने अनेक जन्मों तक पुण्यकर्म (सुकृतिभि:) किये थे और जो भक्ति में निरन्तर लगे हुए थे (श्रवणं कीर्तनं विष्णो:)। भक्ति उन लोगों द्वारा की जाती है जिन्होंने अत्यन्त उच्च कोटि के पुण्यकर्म किये हों। श्रीमद्भागवत में अन्यत्र भी (१०.१२.११) पुण्यकर्मों के संचय का उल्लेख हुआ है जहाँ शुकदेव गोस्वामी कहते हैं—
इत्थं सतां ब्रह्मसखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन।

मायाश्रितानां नरदारकेण साकं विजह्रु: कृतपुण्यपुञ्जा: ॥

“जो लोग भगवान् के ब्रह्मतेज की अनुभूति करते हुए आत्म-साक्षात्कार में लगे हैं और जो लोग भगवान् को स्वामी मान कर भक्ति में लगे हुए हैं तथा वे लोग जो भगवान् को सामान्य व्यक्ति मानते हुए माया के वशीभूत हैं, वे यह नहीं समझ सकते कि पुण्यकर्म संचित किये हुए ऐसे कुछ महापुरुष हैं, जो भगवान् के साथ ग्वालबालों के रूप में मित्र बनकर खेल रहे हैं।”

वृन्दावन के हमारे कृष्ण-बलराम मन्दिर में एक तमाल वृक्ष है, जो आँगन के पूरे एक कोने में छाया हुआ है। जब तक मन्दिर नहीं बना था, यह वृक्ष उपेक्षित रहता था किन्तु अब इसकी इतनी बाढ़ हो गई है कि इसने आँगन के पूरे कोने को घेर लिया है। यह भूरिपुण्य कहलाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥