श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 5

 
श्लोक
अहोऽतिरम्यं पुलिनं वयस्या:
स्वकेलिसम्पन्मृदुलाच्छबालुकम् ।
स्फुटत्सरोगन्धहृतालिपत्रिक-
ध्वनिप्रतिध्वानलसद्‌‌‌द्रुमाकुलम् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
अहो—ओह; अति-रम्यम्—अतीव सुन्दर; पुलिनम्—नदी का किनारा; वयस्या:—मेरे मित्रो; स्व-केलि-सम्पत्—खेलने की सामग्री से युक्त; मृदुल-अच्छ-बालुकम्—मुलायम तथा साफ बालूदार किनारा; स्फुटत्—खिला हुआ; सर:-गन्ध—कमल की गंध से; हृत—आकृष्ट; अलि—भौरें का; पत्रिक—तथा पक्षियों की; ध्वनि-प्रतिध्वान—उनकी चहचहाहट तथा उसकी प्रतिध्वनि; लसत्—गतिशील; द्रुम-आकुलम्—सुन्दर वृक्षों से पूर्ण ।.
 
अनुवाद
 
 मित्रो, देखो न, यह नदी का किनारा अपने मोहक वातावरण के कारण कितना रम्य लगता है! देखो न, खिले कमल किस तरह अपनी सुगन्ध से भौरों तथा पक्षियों को आकृष्ट कर रहे हैं। भौरों की गुनगुनाहट तथा पक्षियों की चहचहाहट जंगल के सभी सुन्दर वृक्षों से प्रतिध्वनित हो रही है। और यहाँ की बालू साफ तथा मुलायम है। अत: हमारे खेल तथा हमारी लीलाओं के लिए यह सर्वोत्तम स्थान है।
 
तात्पर्य
 वृन्दावन के जंगल का यह वर्णन पाँच हजार वर्ष पूर्व कृष्ण द्वारा किया गया था और यही स्थिति ३००-४०० वर्ष पूर्व वैष्णव आचार्यों के समय तक बनी रही। कूजत्कोकिलहंससारसगणाकीर्णे मयूराकुले। वृन्दावन का जंगल सदैव कोकिल, हंस, सारस जैसे पक्षियों की चहक तथा कुहू-कुहू से पूरित
रहता है और इसमें मोर भी रहते हैं (मयूराकुले )। आज भी वही ध्वनि तथा वातावरण उस क्षेत्र में विद्यमान हैं जहाँ हमारा कृष्ण-बलराम मन्दिर स्थित है। जो भी इस मन्दिर को देखने आता है, वह यहाँ पर वर्णित पक्षियों के कलरव को सुन कर प्रसन्न हो जाता है (कूजत्कोकिल-हंससारस )।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥