श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 50

 
श्लोक
चन्द्रिकाविशदस्मेरै: सारुणापाङ्गवीक्षितै: ।
स्वकार्थानामिव रज:सत्त्वाभ्यां स्रष्टृपालका: ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
चन्द्रिका-विशद-स्मेरै:—पूर्ण वर्द्धमान चन्द्रमा की तरह शुद्ध मुसकान से; स-अरुण-अपाङ्ग-वीक्षितै:—अपनी लाल-लाल आँखों की स्वच्छ चितवन से; स्वक-अर्थानाम्—अपने भक्तों की इच्छाओं के; इव—सदृश; रज:-सत्त्वाभ्याम्—रजो तथा सतो गुणों से; स्रष्टृ-पालका:—स्रष्टा तथा पालनकर्ता थे ।.
 
अनुवाद
 
 वे विष्णु रूप जो चंद्रमा के बढ़ते हुए प्रकाश के तुल्य थे, अपनी शुद्ध मुस्कान तथा अपनी लाल-लाल आँखों की तिरछी चितवन के द्वारा, अपने भक्तों की इच्छाओं को, मानो रजोगुण एवं तमोगुण से, उत्पन्न करते तथा पालते थे।
 
तात्पर्य
 ये विष्णुस्वरूप पूर्ण चन्द्रमा के बढ़ते हुए प्रकाश के समान अपनी निर्मल कटाक्षों तथा मुसकानों से भक्तों को आशीर्वाद दे रहे थे (श्रेय:कैरवचन्द्रिकावितरणम् )। पालनकर्ताओं के रूप में वे अपने भक्तों पर कटाक्ष कर रहे थे और उनका आलिंगन कर रहे थे और अपनी मुसकान से उनकी रक्षा कर रहे थे। उनकी हँसी सतो गुण के तुल्य भक्तों की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली थी और उनके कटाक्ष रजोगुण के समान थे। वस्तुत: इस श्लोक में आया हुआ रज: शब्द “काम” का नहीं अपितु “स्नेह” का सूचक है। भौतिक जगत में रजोगुण काम का सूचक है किन्तु आध्यात्मिक जगत में यही स्नेह होता है। भौतिक जगत में रजोगुण तथा तमोगुण से स्नेह कलुषित होता है किन्तु शुद्ध सत्त्व में भक्तों को पालन करने वाला स्नेह दिव्य होता है।
स्वकार्थानाम् सूचक है महती इच्छाओं का। जैसाकि इस श्लोक में उल्लेख है, भगवान् विष्णु की चितवन भक्तों में इच्छाओं को उत्पन्न करने वाली है। किन्तु शुद्ध भक्त में तो कोई इच्छा ही नहीं रहती। इसीलिए सनातन गोस्वामी की टीका है कि जिन भक्तों का ध्यान कृष्ण में लगा है ऐसे भक्तों की इच्छाएँ पहले से पूरी हुई रहती हैं। अत: उनमें भगवान् के कटाक्षों से कृष्ण तथा भक्ति के प्रति तरह तरह की इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। भौतिक जगत में इच्छा तो रजोगुण तथा तमोगुण की उपज होती है किन्तु आध्यात्मिक जगत में इच्छा से तरह-तरह की शाश्वत दिव्य भक्ति उत्पन्न होती है। इस प्रकार स्वकार्थानाम् शब्द कृष्ण की सेवा करने की उत्सुकता को प्रदर्शित करता है।

वृन्दावन में एक स्थान है जहाँ पर कोई मन्दिर नहीं था किन्तु एक भक्त ने चाहा कि यहाँ एक मन्दिर हो जाय और सेवा हो। अतएव जो कभी वीरान स्थान था वही अब तीर्थस्थान बन गया है। भक्तों की इच्छाएँ ऐसी ही होती हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥