श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 51

 
श्लोक
आत्मादिस्तम्बपर्यन्तैर्मूर्तिमद्भ‍िश्चराचरै: ।
नृत्यगीताद्यनेकार्है: पृथक्पृथगुपासिता: ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
आत्म-आदि-स्तम्ब-पर्यन्तै:—ब्रह्मा से लेकर क्षुद्र जीव तक; मूर्ति-मद्भि:—वही रूप धारण करके; चर-अचरै:—चल तथा अचल प्राणियों द्वारा; नृत्य-गीत-आदि-अनेक-अर्है:—पूजा के विविध साधनों द्वारा, यथा नाच और गाने से; पृथक् पृथक्— अलग अलग; उपासिता:—पूजित होकर ।.
 
अनुवाद
 
 चतुर्मुख ब्रह्मा से लेकर क्षुद्र से क्षुद्र जीव, चाहे वे चर हों या अचर, सबों ने स्वरूप प्राप्त कर रखा था और वे अपनी अपनी क्षमताओं के अनुसार नाच तथा गायन जैसी पूजा विधियों से उन विष्णु मूर्तियों की अलग अलग पूजा कर रहे थे।
 
तात्पर्य
 असंख्य जीव अपनी अपनी शक्तियों तथा कर्म के अनुसार पुरुषोत्तम की विभिन्न प्रकार की उपासना में लगे हुए हैं—हर प्राणी व्यस्त है (जीवेर ‘स्वरूप’ हय—कृष्णेर नित्यदास )। कोई ऐसा नहीं मिलेगा जो सेवा न कर रहा हो। इसलिए जो महाभागवत है, वह हर एक को कृष्ण-भक्ति में लगा हुआ देखता है—केवल अपने को ही वह उसमें नहीं लगा हुआ पाता। हमें अपने को निम्न पद से उच्च पद तक उठाना होगा और उच्च पद वह है, जिसमें वृन्दावन में प्रत्यक्ष सेवा की जाती है। लेकिन हर व्यक्ति सेवा में लगा हुआ है। भगवान् की सेवा का निषेध करना ही माया है।
एकले ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य।

यारे यैछे नाचाय, से तैछे करे नृत्य ॥

“केवल कृष्ण सर्वोच्च प्रभु हैं, शेष सभी लोग उनके दास हैं। कृष्ण जैसा चाहते हैं उसी के अनुसार हर व्यक्ति नाचता है।” (चैतन्य चरितामृत आदि ५.१४२)।

जीव दो प्रकार के हैं—चर तथा अचर। उदाहरणार्थ, वृक्ष एक स्थान पर खड़े रहते हैं जबकि चींटियाँ चलती-फिरती हैं। ब्रह्मा ने देखा कि क्षुद्र से क्षुद्र प्राणी भी विभिन्न रूप धारण करके भगवान् विष्णु की सेवा में लगे हुए हैं।

जो जिस विधि से भगवान् की पूजा करता है, उसी के अनुसार उसे रूप मिलता है। भौतिक जगत में जीव को जो शरीर मिलता है, वह देवताओं द्वारा नियंत्रित होता है। इसी को कभी कभी नक्षत्रों का प्रभाव कहा जाता है। भगवद्गीता (३.२७) में इसे ही प्रकृते: क्रियमाणानि शब्दों के द्वारा सूचित किया गया है, जिसका अर्थ है कि प्रकृति के नियमानुसार प्राणी का नियंत्रण देवताओं द्वारा होता है।

सारे जीव कृष्ण की सेवा विविध प्रकारों से करते हैं किन्तु जब वे कृष्णभावनाभावित रहते हैं, तो उनकी सेवा पूरी तरह प्रकट होती है। जिस प्रकार कली में छिपा फूल क्रमश: खिल कर अपनी सुगन्ध तथा सुन्दरता बिखेरता है उसी तरह जब जीव कृष्णभावनामृत पद तक पहुँच जाता है, तो उसके असली स्वरूप का सौन्दर्य पूरी तरह खिल उठता है। यही चरम सौन्दर्य तथा चरम इच्छापूर्ति है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥