श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 52

 
श्लोक
अणिमाद्यैर्महिमभिरजाद्याभिर्विभूतिभि: ।
चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वै: परीता महदादिभि: ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
अणिमा-आद्यै:—अणिमा इत्यादि; महिमभि:—महिमा आदि; अजा-आद्याभि:—अजा आदि; विभूतिभि:—शक्तियों से; चतु:- विंशतिभि:—चौबीस; तत्त्वै:—जगत की सृष्टि के तत्त्वों द्वारा; परीता:—(सारी विष्णु मूर्तियाँ) घिरी हुई; महत्-आदिभि:— महत् तत्त्व इत्यादि से ।.
 
अनुवाद
 
 वे सारी विष्णु मूर्तियाँ अणिमा इत्यादि सिद्धियों, अजा इत्यादि योगसिद्धियों तथा महत तत्त्व आदि सृष्टि के २४ तत्त्वों से घिरी हुई थीं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में आये महिमभि: शब्द का अर्थ ऐश्वर्य है। भगवान् जो चाहे सो कर सकता है। यही उसका ऐश्वर्य है। उस पर कोई आज्ञा नहीं चला सकता है किन्तु वह हर एक को आज्ञा दे सकता है। षड्ऐश्वर्य पूर्णम्—भगवान् छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं। योगसिद्धियाँ—जिनके अन्तर्गत अणिमा या महिमा सिद्धि आती हैं विष्णु में उपस्थित रहती हैं। षड् ऐश्वर्यै पूर्णो य इह भगवान् (चैतन्य- चरितामृत आदि १.३)। अजा का अर्थ
है माया। समस्त मायामय वस्तुएँ विष्णु में निहित होती हैं। जिन २४ तत्त्वों का उल्लेख हुआ है वे हैं—पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच महाभूत, पाँच तन्मात्रा, मन, अहंकार, महत् तत्त्व तथा प्रकृति। इस भौतिक जगत की अभिव्यक्ति में इन सारे चौबीस तत्त्वों का प्रयोग हुआ है। महत् तत्त्व के भी विभिन्न सूक्ष्म विभाग किये जाते हैं किन्तु मूल रूप से इसे महत् तत्त्व कहा जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥