श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 53

 
श्लोक
कालस्वभावसंस्कारकामकर्मगुणादिभि: ।
स्वमहिध्वस्तमहिभिर्मूर्तिमद्भ‍िरुपासिता: ॥ ५३ ॥
 
शब्दार्थ
काल—समय; स्वभाव—स्वभाव; संस्कार—संस्कार; काम—इच्छा; कर्म—सकाम कर्म; गुण—तीन गुण; आदिभि:— इत्यादि के द्वारा; स्व-महि-ध्वस्त-महिभि:—जिसकी स्वतंत्रता भगवान् की शक्ति के अधीन थी; मूर्ति-मद्भि:—स्वरूप वाली; उपासिता:—पूजित हो रहे थे ।.
 
अनुवाद
 
 तब भगवान् ब्रह्मा ने देखा कि काल, स्वभाव, संस्कार, काम, कर्म तथा गुण—ये सभी अपनी स्वतंत्रता खो कर पूर्णतया भगवान् की शक्ति के अधीन होकर स्वरूप धारण किये हुए थे और उन विष्णु मूर्तियों की पूजा कर रहे थे।
 
तात्पर्य
 केवल विष्णु को स्वतंत्रता प्राप्त है। यदि हममें यह चेतना जागृत हो सके तो हम यथार्थ में कृष्णभावनाभावित हैं। हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि कृष्ण ही एकमात्र परम स्वामी हैं और अन्य हर व्यक्ति उनका दास है (एकले ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य )। चाहे कोई नारायण हो या शिवजी, प्रत्येक जीव कृष्ण के अधीन है (शिवविरिञ्चिनुतम् )। यहाँ तक कि बलदेव भी कृष्ण के अधीन हैं। यह तथ्य है।
एकले ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य।

यारे यैछे नाचाय, से तैछे करे नृत्य ॥

(चैतन्य-चरितामृत आदि ५.१४२) मनुष्य को यह समझना चाहिए कि कोई भी स्वतंत्र नहीं है क्योंकि हर कोई कृष्ण का अंश है और कृष्ण की इच्छानुसार काम करता और चलता-फिरता है। यही समझ या चेतना कृष्णभावनामृत है। यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतै।

समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद् ध्रुवम् ॥

“जो व्यक्ति ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवताओं को नारायण के समकक्ष मानता है, वह निश्चित रूप से अपराधी समझा जाना चाहिए।” नारायण या कृष्ण की समता कोई भी नहीं कर सकता। कृष्ण ही नारायण हैं और नारायण ही कृष्ण हैं क्योंकि कृष्ण आदि नारायण हैं। कृष्ण को स्वयंब्रह्मा नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिनाम् कह कर सम्बोधित करते हैं जिसका अर्थ है कि तुम नारायण भी हो, तुम्हीं आदि नारायण हो (भागवत १०.१४.१४)।

काल के अनेक सहायक हैं यथा स्वभाव, संस्कार, काम, कर्म तथा गुण। स्वभाव भौतिक गुणों के मेल के अनुसार बनता है। कारणं गुण-संगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (भगवद्गीता १३.२२)। सत् तथा असत् स्वभाव का निर्माण विभिन्न गुणों—सत्त्व गुण, रजोगुण तथा तमो गुण—के मेल से होता है। हमें क्रमश: सत्त्व गुण प्राप्त करना चाहिए जिससे दो निम्न गुणों से बचा जा सके। यदि हम श्रीमद्भागवत का नित्य मनन करें और कृष्ण के कार्यकलापों को सुनें तो ऐसा हो सकता है। नष्ट प्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया (भागवत १.२.१८)। श्रीमद्भागवत में वर्णित कृष्ण की पूतना सम्बन्धी लीला से लेकर सारी लीलाएँ दिव्य हैं। अतएव श्रीमद्भागवत पर विचार-विमर्श करने तथा इसका श्रवण करने से रजो तथा तमो गुणों का दमन हो जाता है और एकमात्र सत्त्वगुण बच रहता है। तब रजो तथा तमोगुण हमें हानि नहीं पहुँचा पाते।

इसीलिए वर्णाश्रम धर्म अनिवार्य है क्योंकि इससे लोग सत्त्व गुण प्राप्त कर सकते हैं। तदा रजस्तमोभावा: कामलोभादयश्च ये (भागवत १.२.१९)। तमोगुण तथा रजोगुण काम तथा लोभ को बढ़ाने वाले हैं जिससे जीव इस तरह बँध जाता है कि उसे अनेकानेक रूपों में इस जगत में रहना पड़ता है। यह बहुत ही घातक है। इसलिए वर्णाश्रम धर्म की स्थापना करके मनुष्य को सत्त्व गुण प्राप्त कराना होगा। उसमें शुद्ध तथा स्वच्छ रहने, प्रात:काल जल्दी उठने तथा मंगल आरात्रिक देखने जैसे ब्राह्मण- गुणों को विकसित करना होगा। इस तरह सत्त्व गुण प्राप्त होने पर मनुष्य तमोगुण तथा रजोगुण द्वारा प्रभावित नहीं हो सकेगा।

तदा रजस्तमोभावा: कामलोभादयश्च ये।

चेत एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति ॥

(भागवत १.२.१९) इस शुद्धि का सुअवसर मानव जीवन का विशेष अंग है, दूसरे जीवनों में यह सम्भव नहीं। ऐसी शुद्धि राधा-कृष्ण भजन द्वारा भी आसानी से प्राप्त की जा सकती है। इसीलिए नरोत्तमदास ठाकुर ने गाया है—हरि हरि विफले जन्म गँवाइनु—जिसका अर्थ है कि जब तक राधा-कृष्ण की पूजा नहीं की जाती यह मनुष्य-जीवन व्यर्थ हो जाता है। वासुदेवे भगवति भक्ति-योग:प्रयोजित:।जनयत्याशु वैराग्यम् (भागवत १.२.७)। वासुदेव की सेवा में लगने पर मनुष्य को इस भौतिक जीवन से शीघ्र ही विरक्ति हो जाती है। उदाहरणार्थ, कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सदस्य वासुदेव-भक्ति में लगे रहने से तुरन्त ही अच्छे वैष्णव बन जाते हैं—यहाँ तक कि लोगों को यह देख कर आश्चर्य होता है कि म्लेच्छ तथा यवन इस अवस्था को प्राप्त हो सके हैं। यह वासुदेव-भक्ति से सम्भव है। किन्तु यदि हम इस मनुष्य जीवन में सत्त्व गुण प्राप्त नहीं कर पाते तो जैसाकि नरोत्तमदास ठाकुर गाते हैं—हरि हरि विफले जन्म गँवाइनु—तो इस मनुष्य जीवन को प्राप्त करने से कोई लाभ नहीं है।

श्री वीरराघव आचार्य की टीका है कि इस श्लोक के प्रथम पद में उल्लिखित एक एक बात भवबन्धन की कारण है। काल प्रकृति के गुणों को क्षुब्ध करता है और स्वभाव इन गुणों के मेल का प्रतिफल होता है। इसलिए नरोत्तमदास ठाकुर कहते हैं—भक्तसने वास। यदि भक्तों की संगति की जाती है, तो मनुष्य का स्वभाव बदल जाता है। हमारा कृष्णभावनामृत आन्दोलन लोगों को सत्संगति प्रदान करने के हेतु है, जिससे यह परिवर्तन आ सके और हम देख रहे हैं कि इस विधि से सारे विश्व के लोग धीरे-धीरे भक्त बन रहे हैं।

जहाँ तक संस्कार का सम्बन्ध है यह अच्छी संगति से संभव है, क्योंकि अच्छी संगति से अच्छी आदतें बनती हैं और आदत ही द्वितीय स्वभाव बन जाती है। इसलिए भक्तसने वास—लोगों को भक्तों के साथ रहने का अवसर मिलना चाहिए। तभी उनकी आदतें बदलेंगी। मनुष्य जीवन में यह अवसर मिलता है किन्तु नरोत्तमदास ठाकुर गाते हैं—हरि हरि विफले जनम गँवाइनु—यदि लोग इस अवसर का लाभ उठाने में विफल रहते हैं, तो उनका मनुष्य-जीवन व्यर्थ जाता है। इसलिए मानव समाज को नीचे जाने से बचाने का और लोगों को वास्तव में ऊपर उठाने का हम प्रयास कर रहे हैं।

जहाँ तक काम तथा कर्म की बात है, यदि मनुष्य अपने को भक्ति में लगाता है, तो उसका स्वभाव इन्द्रिय-भोग में अपने को लगाने से बने स्वभाव की अपेक्षा भिन्न होता है। इसका परिणाम भी निस्संदेह भिन्न होता है। मनुष्य को विभिन्न स्वभावों की संगति के अनुसार ही विशेष प्रकार का शरीर प्राप्त होता है। कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनि जन्मसु (भगवद्गीता १३.२२)। इसलिए हमें अच्छी संगति—भक्तों की संगति—खोजनी चाहिए। तभी हमारा जीवन सार्थक होगा। मनुष्य की पहचान उसकी संगति से होती है। यदि मनुष्य को भक्तों की सत्संगति में रहने का अवसर मिलता है, तो वह ज्ञान का अनुशीलन करने में समर्थ होता है और उसका चरित्र अथवा स्वभाव भी उसी के अनुसार उसके स्थायी लाभ के लिए बदल जाता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥