श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 54

 
श्लोक
सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तय: ।
अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषद्‍‌द‍ृशाम् ॥ ५४ ॥
 
शब्दार्थ
सत्य—शाश्वत; ज्ञान—ज्ञान से युक्त; अनन्त—असीम; आनन्द—आनन्द से पूर्ण; मात्र—केवल; एक-रस—सदैव स्थित; मूर्तय:—स्वरूप; अस्पृष्ट-भूरि-माहात्म्या:—जिसकी महती महिमा छू तक नहीं जाती; अपि—भी; हि—क्योंकि; उपनिषत्- दृशाम्—उपनिषदों का अध्ययन करने वाले ज्ञानियों द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 वे समस्त विष्णु मूर्तियाँ शाश्वत, असीम स्वरूपों वाली, ज्ञान तथा आनन्द से पूर्ण एवं काल के प्रभाव से परे थीं। उपनिषदों के अध्ययन में रत ज्ञानीजन भी उनकी महती महिमा का स्पर्श तक नहीं कर सकते थे।
 
तात्पर्य
 केवल शास्त्र-ज्ञान से भगवान् को समझने में सहायता नहीं मिल सकती। जिस पर भगवान् की कृपा होती है, वही उन्हें समझ पाता है। उपनिषदों में (मुण्डक उपनिषद ३.२.३) भी इसकी व्याख्या की गई है—
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधसा न बहुना श्रुतेन।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥

“परमेश्वर की प्राप्ति न तो दक्ष व्याख्याओं द्वारा, न ही विशाल बुद्धि द्वारा न ही अधिक श्रवण करने से होती है। वे तो उसे प्राप्त होते हैं जिसे वे स्वयं चुनते हैं। ऐसे व्यक्ति को वे अपना स्वरूप प्रदर्शित करते हैं।”

ब्रह्म का एक वर्णन है—सत्यं ब्रह्म, आनन्दरूपम्—ब्रह्म परम सत्य तथा पूर्ण आनन्द है। यद्यपि विष्णु अर्थात् परब्रह्म के स्वरूप एक थे किन्तु वे भिन्न भिन्न प्रकार से व्यक्त थे। किन्तु उपनिषदों के अनुयायी ब्रह्म द्वारा प्रकट नाना रूपों को नहीं समझ पाते। इसका अर्थ यह हुआ कि ब्रह्म तथा परमात्मा को केवल भक्ति द्वारा जाना जा सकता है, जिसकी पुष्टि भगवान् ने श्रीमद्भागवत (११.१४.२१) में की है—भक्त्याहमेकया ग्राह्य:। ब्रह्म के दिव्य स्वरूप की स्थापना हेतु श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर शास्त्रों से विविध उद्धरण देते हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद (३.८) में ब्रह्म को आदित्यवर्णं तमस: परस्तात्— जिनका स्वरूप सूर्य के समान ज्योतिमान तथा अज्ञान के अंधकार से परे है। आनन्दमात्रम् अजरं पुराणमेकं सन्तं बहुधा दृश्यमानम्—ब्रह्म आनन्दपूर्ण हैं, उनमें दुख का लेश नहीं। वे सबसे पुराने होकर भी कभी बूढ़े नहीं होते हैं और एक होते हुए भी अनेक रूपों में अनुभव किये जाते हैं सर्वे नित्या: शाश्वताश् च देहास् तस्य परात्मान:। उन परम पुरुष के सभी रूप शाश्वत हैं (महावराह पुराण )। परम पुरुष का रूप हाथ-पाँव आदि से युक्त होता है लेकिन उनके हाथ-पाँव भौतिक नहीं होते। भक्तगण जानते हैं कि ब्रह्म अथवा कृष्ण का स्वरूप रंच-भर भी भौतिक नहीं होता प्रत्युत ब्रह्म दिव्य स्वरूप वाले हैं और जब कोई व्यक्ति भक्तिपूर्वक उनमें लीन होता है तभी वह उन्हें समझ सकता है (प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन )। किन्तु मायावादी इस दिव्य रूप को नहीं समझ सकते क्योंकि वे इसे भौतिक मानते हैं।

भगवान् के साकार दिव्य रूप इतने महान् हैं कि उपनिषदों के निर्विशेष अनुयायी उन्हें समझने के लिये ज्ञान के उस पद तक पहुँच नहीं सकते। विशेष रूप से भगवान् के दिव्य रूप उन निर्विशेषवादियों की पहुँच के परे होते हैं, जो उपनिषदों के अध्ययन के द्वारा इतना ही समझ पाते हैं कि परब्रह्म पदार्थ नहीं है और वह सीमित शक्ति द्वारा बँधा नहीं है।

यद्यपि कृष्ण का दर्शन उपनिषदों के माध्यम से नहीं किया जा सकता किन्तु कहीं कहीं ऐसा कहा गया है कि इस विधि से वस्तुत: कृष्ण को जाना जा सकता है। औपनिषदं पुरुषम्—वह उपनिषदों के द्वारा जाना जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि वैदिक ज्ञान से शुद्ध होने पर मनुष्य को भक्ति ज्ञान में प्रविष्ट होने दिया जाता है (मद्भक्तिं लभते पराम् )।

तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञान वैराग्ययुक्तया।

पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतगृहीतया ॥

“एक जिज्ञासु अथवा मुनि, जो ज्ञान तथा वैराग्य से भलीभाँति युक्त होता है, वह परब्रह्म की अनुभूति वेदान्त श्रुति से सुनी हुई भक्ति करके करता है।” (भागवत १.२.१२)। श्रुतगृहीतया सूचक है वेदान्त ज्ञान का, किसी भावना या अनुभूति का नहीं। श्रुतगृहीत गम्भीर ज्ञान होता है।

इस प्रकार ब्रह्मा को लगा कि भगवान् विष्णु सत्य, ज्ञान तथा आनन्द के आगार हैं। वे इन तीन दिव्य स्वरूपों से युक्त हैं और उपनिषदों के अनुयायियों के आराध्य हैं। ब्रह्मा ने अनुभव किया कि गौवों, बछड़ों तथा लडक़ों को जो विष्णु रूप प्राप्त हुए हैं, वे किसी योगी या देवता में निहित विशेष शक्ति के प्रदर्शन नहीं हैं। विष्णु मूर्तियों के रूप में ये गौवें, बछड़े तथा बालक विष्णु-माया के प्रदर्शन न होकर साक्षात् विष्णु हैं। विष्णु तथा विष्णु माया के क्रमिक गुण अग्नि तथा उष्मा जैसे हैं। उष्मा में अग्नि का गुणहै किन्तु वह अग्नि नहीं है। बछड़ों, गौवों तथा बालकों के रूप में विष्णु स्वरूपों की अभिव्यक्ति उष्मा के तुल्य नहीं अपितु अग्नि के तुल्य थी—वे सचमुच विष्णु थे। यथार्थरूप में विष्णु तो सच्चिदानन्द विग्रह हैं। दूसरा उदाहरण भौतिक पदार्थों से दिया जा सकता है, जो कई रूपों में प्रतिबिम्बित होते हैं। इसी तरह सूर्य अनेक जलपात्रों में प्रतिबिम्बित होता है किन्तु पात्रों में दिखने वाले प्रतिबिम्ब सूर्य नहीं होते। इन प्रतिबिम्बों में सूर्य का वास्तविक प्रकाश तथा उष्मा नहीं रहते यद्यपि यह सूर्य की भाँति ही दिखाई देता है। किन्तु कृष्ण ने जितने सारे स्वरूप धारण कर रखे थे वे सबके सब विष्णु थे।

हमें चाहिए कि यथासम्भव हम प्रतिदिन श्रीमद्भागवत के बारे में चर्चा करें जिससे हर बात स्पष्ट हो सके क्योंकि भागवत समस्त वैदिक वाङ्मय का सार है (निगमकल्पतरोर्गलितं फलम् )। इसे व्यासदेव ने तब लिखा जब वे आत्मज्ञान प्राप्त कर चुके थे (महामुनिकृते )। अत: हम भागवत का जितना ही अध्ययन करेंगे, ज्ञान उतना ही स्पष्ट होता जायेगा। इसका प्रत्येक श्लोक दिव्य है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥