श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 56

 
श्लोक
ततोऽतिकुतुकोद्‌वृत्यस्तिमितैकादशेन्द्रिय: ।
तद्धाम्नाभूदजस्तूष्णीं पूर्देव्यन्तीव पुत्रिका ॥ ५६ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तब; अतिकुतुक-उद्वृत्य-स्तिमित-एकादश-इन्द्रिय:—जिनकी ग्यारह इन्द्रियाँ आश्चर्य के कारण क्षुब्ध हो चुकी थीं और दिव्य आनन्द के कारण स्तम्भित हो गई थीं; तद्-धाम्ना—उन विष्णु मूर्तियों के तेज से; अभूत्—हो गया; अज:—ब्रह्मा; तूष्णीम्—मौन; पू:-देवी-अन्ति—ग्राम्य देवता की उपस्थिति में; इव—जिस तरह; पुत्रिका—बच्चे द्वारा बनाया गया मिट्टी का खिलौना ।.
 
अनुवाद
 
 तब उन विष्णु मूर्तियों की तेज शक्ति से ब्रह्मा की ग्यारहों इन्द्रियाँ आश्चर्य से क्षुब्ध तथा दिव्य आनन्द से स्तब्ध हो चुकी थीं अत: वे मौन हो गये मानो ग्राम्य देवता की उपस्थिति में किसी बच्चे की मिट्टी की बनी गुडिय़ा हो।
 
तात्पर्य
 दिव्य आनन्द से ब्रह्मा स्तब्ध थे (मुह्यन्ति यत् सूरय:)। आश्चर्यचकित होने से उनकी सारी इन्द्रियाँ स्तब्ध हो गई थीं और वे कुछ भी कह पाने में असमर्थ थे। ब्रह्मा ने अपने आपको एकमात्र शक्तिमान देवता मान कर सर्वोच्च समझ रखा था किन्तु उनका वह गर्व अब चूर-चूर हो गया और वे पुन: मात्र एक देवता रह गये। अत: ब्रह्मा कभी ईश्वर—कृष्ण या नारायण—की समता नहीं कर सकते। नारायण की तुलना ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवताओं से भी करना वर्जित है, तो अन्य देवताओं से तुलना तो की ही नहीं जा सकती।
यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतै।

समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद्ध्रुवम् ॥

“जो व्यक्ति ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवताओं को नारायण के समकक्ष मानता है उसे निस्संदेह अपराधी समझना चाहिए।” हमें चाहिए कि नारायण की समता किसी देवता से न करें क्योंकि शंकराचार्य तक ने इसके लिए वर्जित किया है (नारायण: परोऽव्यक्तात् )। यही नहीं, वेदों में भी उल्लेख है—एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशान:—सृष्टि के प्रारम्भ में केवल नारायण थे। ब्रह्मा या शिव का अस्तित्व तक न था—इसीलिए जो भी अपने जीवन के अन्त समय में नारायण का स्मरण करता है उसे जीवन-सिद्धि प्राप्त होती है (अन्ते नारायणस्मृति:)।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥