श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 58

 
श्लोक
ततोऽर्वाक्प्रतिलब्धाक्ष: क: परेतवदुत्थित: ।
कृच्छ्रादुन्मील्य वै द‍ृष्टीराचष्टेदं सहात्मना ॥ ५८ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तब; अर्वाक्—बाह्य; प्रतिलब्ध-अक्ष:—चेतना जागृत होने पर; क:—ब्रह्मा; परेत-वत्—मृत व्यक्ति की तरह; उत्थित:—उठ खड़े हुए; कृच्छ्रात्—कठिनाई से; उन्मील्य—खोल कर; वै—निस्सन्देह; दृष्टी:—अपनी आँखें; आचष्ट—देखा; इदम्—इस ब्रह्माण्ड को; सह-आत्मना—अपने सहित ।.
 
अनुवाद
 
 तब ब्रह्मा की बाह्य चेतना वापस लौटी और वे इस तरह उठ खड़े हुए मानो मृत व्यक्ति जीवित हो उठा हो। बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोलते हुए उन्होंने अपने सहित ब्रह्माण्ड को देखा।
 
तात्पर्य
 वास्तव में हम मरते नहीं। मृत्यु के समय हम कुछ समय तक निश्चल रहते हैं जैसे नींद में हों। रात्रि में जब हम सोते हैं, तो हमारे सारे कार्य ठप्प हो जाते हैं किन्तु ज्योंही हम जग जाते हैं, तो हमारी स्मृति तत्क्षण लौट आती है और हम सोचने लगते हैं, “अरे मैं कहो हूँ? मुझे क्या करना है?” यह सुप्तोत्थितन्याय कहलाता है। मान लीजिये हम मर जाते हैं। “मरने” का अर्थ है कुछ काल तक निष्क्रिय रहना और फिर से अपने कार्य चालू कर देना। यह क्रम हमारे कर्म तथा स्वभाव के अनुसार जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है। यदि मनुष्य-जीवन में हम अपने कार्यकलाप आध्यात्मिक जीवन के कार्य से शुरू करें तो हम असली जीवन में लौट आते हैं और सिद्धि प्राप्त करते हैं।
अन्यथा कर्म, स्वभाव, प्रकृति इत्यादि के अनुसार तरह-तरह के जीवन तथा कार्य चलते रहते हैं और उसी तरह हमारे जन्म तथा मृत्यु भी चलते हैं। भक्तिविनोद ठाकुर ने बतलाया है—मायार वशे याच्छ भेसे, खाच्छ हाबुडुब भाइ—प्यारे भाइयो! तुम माया की लहरों में क्यों बहे चले जा रहे हो? आध्यात्मिक पद को प्राप्त करने पर ही कार्य स्थायी हो सकते हैं। कृतपुण्यपुञ्जा:—अनेकानेक जीवन के पुण्यकर्मों के संचित होने पर ही यह अवस्था प्राप्त होती है। जन्मकोटिसुकृतैर्न लभ्यते (चैतन्य-चरितामृत मध्य ८.७०)। कृष्णभावनामृत आन्दोलन जन्म-मृत्यु के चक्र, कोटिजन्म, को रोकना चाहता है। एक जन्म में सब ठीक करके स्थायी जीवन बिताना यही कृष्णभावनामृत है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥