श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 60

 
श्लोक
यत्र नैसर्गदुर्वैरा: सहासन् नृमृगादय: ।
मित्राणीवाजितावासद्रुतरुट्‌‌तर्षकादिकम् ॥ ६० ॥
 
शब्दार्थ
यत्र—जहाँ; नैसर्ग—प्रकृति द्वारा; दुर्वैरा:—वैर होने पर; सह आसन्—साथ साथ रहते हैं; नृ—मनुष्य; मृग-आदय:—तथा पशु; मित्राणि—मित्रगण; इव—सदृश; अजित—श्रीकृष्ण के; आवास—निवासस्थान; द्रुत—चले गये; रुट्—क्रोध; तर्षक- आदिकम्—प्यास इत्यादि ।.
 
अनुवाद
 
 वृन्दावन भगवान् का दिव्य धाम है जहाँ न भूख है, न क्रोध, न प्यास। यद्यपि मनुष्यों तथा हिंस्र पशुओं में स्वाभाविक वैर होता है किन्तु वे यहाँ दिव्य मैत्री-भाव से साथ साथ रहते हैं।
 
तात्पर्य
 वन का अर्थ है जंगल। हम जंगल से डर कर वहाँ नहीं जाना चाहते किन्तु वृन्दावन के जंगली जीव देवताओं के ही समान हैं क्योंकि वे वैर नहीं रखते। इस भौतिक जगत में भी जंगल में पशु एकसाथ रहते हैं और जब वे पानी पीने जाते हैं, तो किसी पर आक्रमण नहीं करते। वैर उपजने का कारण इन्द्रियभोग है लेकिन वृन्दावन में इन्द्रियभोग है ही नहीं क्योंकि वहाँ तो कृष्ण की तुष्टि ही सबों का एकमात्र लक्ष्य रहता है। इस भौतिक जगत में भी वृन्दावन के पशु जंगल में रहने वाले साधुओं से वैर नहीं रखते। साधुगण गौवें पालते हैं और सिंहों को दूध पिलाते हैं और उन्हें कहते हैं कि यहाँ आओ और थोड़ा-सा दूध पी लो। इस तरह वृन्दावन में वैर तथा ईर्ष्या का नामोनिशान नहीं है। वृन्दावन तथा सामान्य जगत में यही अन्तर है। हम वन का नाम सुन कर डर जाते हैं किन्तु वृन्दावन में ऐसा भय नहीं है। वहाँ प्रत्येक व्यक्ति कृष्ण को प्रसन्न करके सुखी है। कृष्णोत्कीर्तनगाननर्तनपरौ। चाहे वह गोस्वामी हो, अथवा सिंह या कोई अन्य हिंस्र पशु—हर एक का कार्य एक ही है—कृष्ण को तुष्ट रखना। सिंह भी भक्त हैं। वृन्दावन की यह विशेषता है। वृन्दावन में हर व्यक्ति सुखी है। वहाँ बछड़ा सुखी है, बिल्ली तथा कुत्ता सुखी हैं और मनुष्य भी सुखी है। हर कोई अपनी अपनी क्षमता के अनुसार कृष्ण की सेवा करना चाहता है, अत: वैर का नामोनिशान नहीं रहता। कोई कभी कभी यह सोच सकता है कि वृन्दावन के बन्दर वैर रखते हैं क्योंकि वे भोजन छीन लेते हैं और उत्पात मचाते हैं किन्तु हम देखते हैं कि वहाँ बन्दरों को भी मक्खन खाने दिया जाता है जैसाकि श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं। कृष्ण ने यह स्वयं दिखला दिया है कि हर प्राणी को जीवित रहने का अधिकार है। यह वृन्दावन का जीवन है। भला मैं क्यों जीवित रहूँ और आप मरें? नहीं। यह तो भौतिक जीवन है। वृन्दावन के निवासी सोचते हैं, “कृष्ण ने जो कुछ दिया है उसे हम प्रसाद के रूप में बाँट कर खायें।” यह मनोवृत्ति एकाएक नहीं उत्पन्न हो सकती, इसका विकास कृष्णभावनामृत के साथ साथ धीरे-धीरे होगा। साधन द्वारा इस पद तक पहुँचा जा सकता है।
इस भौतिक जगत में नि:शुल्क भोजन वितरण के लिए सारे विश्व से चन्दा एकत्र किया जा सकता है किन्तु जिनको यह भोजन दिया जाता है, हो सकता है वे इसे पसन्द न करें। किन्तु कृष्णभावनामृत के महत्त्व को क्रमश: पसन्द किया जायेगा। उदाहरणार्थ, डर्बन दक्षिण अफ्रीका में हरे कृष्ण आन्दोलन के मन्दिर के विषय में डर्बन पोस्ट समाचार-पत्र ने समाचार छापा है : “यहाँ सारे भक्त भगवान् कृष्ण की सेवा में तत्पर हैं जिसके परिणाम सुस्पष्ट हैं—सुख, उत्तम स्वास्थ्य, मन:शान्ति तथा सभी सद्गुणों का विकास।” वृन्दावन की प्रकृति ऐसी ही है। हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा:—कृष्णभावनामृत के बिना सुख असम्भव है। कोई भले ही संघर्ष करे किन्तु सुख नहीं पा सकता। अतएव हम कृष्णभावनामृत के माध्यम से मानव समाज को जीवन-सुख, उत्तम स्वास्थ्य, मन:शान्ति तथा समस्त सद्गुण प्रदान करने के लिए अवसर देने का प्रयास कर रहे हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥