श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 62

 
श्लोक
द‍ृष्ट्वा त्वरेण निजधोरणतोऽवतीर्य
पृथ्व्यां वपु: कनकदण्डमिवाभिपात्य ।
स्पृष्ट्वा चतुर्मुकुटकोटिभिरङ्‍‍घ्रियुग्मं
नत्वा मुदश्रुसुजलैरकृताभिषेकम् ॥ ६२ ॥
 
शब्दार्थ
दृष्ट्वा—देख कर; त्वरेण—तेजी से; निज-धोरणत:—अपने वाहन हंस से; अवतीर्य—उतरे; पृथ्व्याम्—पृथ्वी पर; वपु:—उनका शरीर; कनक-दण्डम् इव—सोने की छड़ी जैसा; अभिपात्य—गिर पड़े; स्पृष्ट्वा—छूकर; चतु:-मुकुट-कोटि-भि:—अपने चारों मुकुटों के सिरों से; अङ्घ्रि-युग्मम्—दोनों चरणकमलों को; नत्वा—नमस्कार करके; मुत्-अश्रु-सु-जलै:—अपने प्रसन्नता के अश्रुओं के जल से; अकृत—सम्पन्न किया; अभिषेकम्—उनके चरणकमल पखारने का उत्सव ।.
 
अनुवाद
 
 यह देख कर ब्रह्मा तुरन्त अपने वाहन हंस से नीचे उतरे और भूमि पर सोने के दण्ड के समान गिर कर भगवान् कृष्ण के चरणकमलों का स्पर्श अपने सिर में धारण किये हुए चारों मुकुटों के अग्रभागों (सरों) से किया। उन्होंने नमस्कार करने के बाद अपने हर्ष-अश्रुओं के जल से कृष्ण के चरणकमलों को नहला दिया।
 
तात्पर्य
 ब्रह्माजी दण्ड के समान नतमस्तक हुए और चूँकि ब्रह्मा का रंग सुनहरा है, अत: वे कृष्ण के सामने सुनहरे दंड के समान प्रतीत हुए। जब कोई व्यक्ति अपने गुरुजन के समक्ष दण्ड के समान गिरता है, तो उसका नमस्कार दण्डवत् (“दंड के समान”) कहलाता है। ‘दण्ड’ का अर्थ है ‘दंड’ और ‘वत्’ का अर्थ है ‘के समान’। ऐसा नहीं है कि कोई केवल दण्डवत् कहे, अपितु उसे गिरना चाहिए। इस तरह ब्रह्मा ने दण्डवत् किया, कृष्ण के चरणकमलों को अपने मस्तकों से छुआ और प्रेमवश उनके क्रन्दन को कृष्ण के चरणकमलों का अभिषेक समझना चाहिए।
ब्रह्मा के समक्ष जो व्यक्ति बालक रूप में प्रकट हुआ था वह वास्तव में परम सत्य परब्रह्म था (ब्रह्मेति परमात्येति भगवान् इति शब्द्यते )। परमेश्वर नराकृति हैं अर्थात् वे मनुष्य जैसे लगते हैं। वे चतुर्बाहु नहीं हैं। नारायण चतुर्बाहु हैं किन्तु परम पुरुष नराकृति हैं। बाइबिल से भी इसकी पुष्टि होती है जहाँ कहा गया है कि मनुष्य को ईश्वर की मूर्ति सदृश बनाया गया।

ब्रह्मा ने देखा कि ग्वालबाल के वेश में कृष्ण परब्रह्म हैं, जो सर्वकारणों के कारण हैं किन्तु अब वे ही बालक रूप में अपने हाथ में भोजन का कौर लिए वृन्दावन में इधर-उधर टहल रहे हैं। आश्चर्यचकित ब्रह्माजी अपने वाहन हंस से उतर पड़े और भूमि पर गिर कर उन्हें नमस्कार किया। सामान्यतया देवता पृथ्वी का स्पर्श नहीं करते किन्तु ब्रह्मा ने स्वेच्छा से देवता की प्रतिष्ठा त्याग कर कृष्ण के समक्ष पृथ्वी पर दण्डवत किया। यद्यपि ब्रह्मा का हर दिशा में एक सिर है, वे स्वेच्छा से अपने सभी सिरों को पृथ्वी पर लाए और उन्होंने कृष्ण के चरणों को अपने चारों मुकुटों के अग्रभागों से छुआ। यद्यपि उनकी बुद्धि सभी दिशाओं में कार्य करती है किन्तु उन्होंने बालक कृष्ण के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया।

उल्लेख हुआ है कि ब्रह्मा ने कृष्ण के चरणों को अपने अश्रुओं से प्रक्षालित किया। यहाँ पर सुजलै शब्द सूचित करता है कि उनके अश्रु शुद्ध थे। भक्ति के उदय होने पर प्रत्येक वस्तु शुद्ध बन जाती है (सर्वोपाधि विनिर्मुक्तम् )। इसलिए ब्रह्मा का क्रन्दन भक्त्यनुभाव अर्थात् दिव्य आह्लाद का एक रूप था।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥