श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  »  श्लोक 64

 
श्लोक
शनैरथोत्थाय विमृज्य लोचने
मुकुन्दमुद्वीक्ष्य विनम्रकन्धर: ।
कृताञ्जलि: प्रश्रयवान् समाहित:
सवेपथुर्गद्गदयैलतेलया ॥ ६४ ॥
 
शब्दार्थ
शनै:—धीरे-धीरे; अथ—तब; उत्थाय—उठ कर; विमृज्य—पोंछ कर; लोचने—अपनी दोनों आँखें; मुकुन्दम्—मुकुन्द या भगवान् कृष्ण को; उद्वीक्ष्य—ऊपर देखते हुए; विनम्र-कन्धर:—अपनी गर्दन झुकाये; कृत-अञ्जलि:—हाथ जोड़े हुए; प्रश्रय वान्—अत्यन्त विनीत; समाहित:—मन को एकाग्र किये; स-वेपथु:—काँपते हुए शरीर से; गद्गदया—अवरुद्ध; ऐलत—ब्रह्मा प्रशंसा करने लगे; ईलया—शब्दों से ।.
 
अनुवाद
 
 तब धीरे-धीरे उठते हुए और अपनी दोनों आँखें पोंछते हुए ब्रह्मा ने मुकुन्द की ओर देखा। फिर अपना सिर नीचे झुकाये, मन को एकाग्र किये तथा कंपित शरीर से वे लडख़ड़ाती वाणी से विनयपूर्वक भगवान् कृष्ण की प्रशंसा करने लगे।
 
तात्पर्य
 प्रसन्नता के मारे ब्रह्मा अश्रुपात करने लगे और उन्होंने अपने आँसुओं से कृष्ण के चरणकमलों को धो दिया। वे कृष्ण की अद्भुत लीलाओं का स्मरण कर करके बारम्बार गिरने और उठने लगे। दीर्घकाल तक नमस्कार करते रहने के बाद ब्रह्माजी उठ खड़े हुए और अपने अश्रुओं
को पोंछा। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की टीका है कि लोचने शब्द इंगित करता है कि उन्होंने दोनों हाथों से अपने चारों मुखों की दो-दो आँखों को पोंछा। अपने समक्ष भगवान् को देख कर ब्रह्माजी ने अत्यन्त विनय, आदर तथा मनोयोग से स्तुति करनी शुरू की।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के अन्तर्गत “ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी” नामक तेरहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥