श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 13: ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में ब्रह्माजी द्वारा ग्वालबालों तथा बछड़ों को चुराने के प्रयास के वर्णन के साथ ही ब्रह्माजी के मोहित होने तथा मोह के हटने का वर्णन हुआ है।
यद्यपि अघासुर सम्बन्धी घटना एक वर्ष पूर्व घट चुकी थी जब ग्वालबाल पाँच वर्ष के थे किन्तु जब वे छह वर्ष के हुए तो उन्होंने कहा, “यह घटना तो आज घटी है।” जो हुआ था वह इस प्रकार है। अघासुर को मारने के बाद कृष्ण तथा उनके संगी जंगल में विहार करने चले गये। बछड़े हरी घास से आकृष्ट होकर चरते-चरते जब दूर चले गये तो कृष्ण के संगी कुछ-कुछ क्षुब्ध हुए और उन्होंने अपने बछड़ों को वापस लाना चाहा। किन्तु कृष्ण ने ग्वालबालों को यह कह कर प्रोत्साहित किया, “तुम क्षुब्ध हुए बिना अपना भोजन करो। बछड़ों को ढूँढऩे मैं जाऊँगा।” इस तरह कृष्ण वहाँ से चले गये। तब कृष्ण की शक्ति की परीक्षा लेने के लिए ही ब्रह्माजी सारे बछड़ों तथा ग्वालबालों को चुरा ले गये और ले जाकर उन्हें एकान्त स्थान में रख दिया।

जब कृष्ण बछड़ों तथा बालकों को न ढूँढ़ पाये तो वे समझ गये कि यह ब्रह्मा की चाल है। फिर समस्त कारणों के कारण भगवान् ने ब्रह्माजी को तथा अपने संगियों और उनकी माताओं को प्रसन्न करने के लिए अपना विस्तार किया जिससे वे पूर्ववत् बछड़े तथा बालक बन जाँय। इस तरह उन्होंने अन्य लीला खोज निकाली। इस लीला की विशेषता यह थी कि ग्वालबालों की माताएँ अपने अपने पुत्रों से और अधिक अनुरक्त हो गईं और गाएँ अपने बछड़ों से। लगभग एक वर्ष बाद बलदेव ने देखा कि सारे ग्वालबाल तथा सारे बछड़े कृष्ण के विस्तार हैं तब उन्होंने कृष्ण से पूछा और उन्होंने जो कुछ हुआ था बतला दिया।

पूरा एक वर्ष बीतने पर जब ब्रह्मा लौटे तो देखा कि कृष्ण पूर्ववत् अपने मित्रों, अपनी गौओं तथा बछड़ों के साथ खेल रहे थे। कृष्ण ने सारे बछड़ों तथा ग्वालबालों को नारायण के चतुर्भज रूप में प्रदर्शित किया। तब जाकर ब्रह्मा को कृष्ण की शक्ति का पता लग सका और वे अपने आराध्यदेव कृष्ण की लीलाओं पर आश्चर्यचकित रह गये। किन्तु कृष्ण ने ब्रह्मा को अपनी अहैतुकी कृपा प्रदान की और उन्हें मोह से मुक्त किया। इस तरह ब्रह्माजी भगवान् का गुणगान करने के लिए स्तुति करने लगे।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥