श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 14

 
श्लोक
नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिना-
मात्मास्यधीशाखिललोकसाक्षी ।
नारायणोऽङ्गं नरभूजलायना-
त्तच्चापि सत्यं न तवैव माया ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
नारायण:—भगवान् नारायण; त्वम्—तुम; न—नहीं; हि—क्या; सर्व—सभी; देहिनाम्—देहधारी जीवों के; आत्मा—परमात्मा; असि—हो; अधीश—हे परम नियन्ता; अखिल—सम्पूर्ण; लोक—लोकों के; साक्षी—गवाह; नारायण:—श्री नारायण; अङ्गम्—अंश; नर—भगवान् से; भू—निकलकर; जल—जल के; अयनात्—प्रकट करने वाले स्रोत होने से; तत्—वह अंश; च—तथा; अपि—निस्सन्देह; सत्यम्—सच; न—नहीं; तव—तुम्हारा; एव—तनिक भी; माया—मोहक शक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 हे परम नियन्ता, प्रत्येक देहधारी जीव के आत्मा तथा समस्त लोकों के शाश्वत साक्षी होने के कारण क्या आप आदि नारायण नहीं हैं? निस्सन्देह, भगवान् नारायण आपके ही अंश हैं और वे नारायण इसलिए कहलाते हैं क्योंकि ब्रह्माण्ड के आदि जल के जनक हैं। वे सत्य हैं, आपकी माया से उत्पन्न नहीं हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील प्रभुपाद ने चैतन्य-चरितामृत (आदि लीला, २.३०)में इस श्लोक की टीका इस प्रकार की है “यह ब्रह्मा का कथन है जब वे भगवान् कृष्ण द्वारा योगशक्ति प्रकट किये जाने पर पराजित होकर उनकी स्तुति कर रहे थे। ब्रह्मा ने यह देखने के लिए भगवान् कृष्ण की परीक्षा लेनी चाही थी कि ग्वाल-बाल के रूप में खेलनेवाले कृष्ण सचमुच भगवान् ही हैं। ब्रह्मा ने अन्य सारे बालकों तथा उनकी गौवों को चरागाह से चुरा लिया किन्तु जब वे लौटे तो देखा कि सारे बालक तथा गौवें चरागाह में ही थे क्योंकि भगवान् ने फिर से उनकी सृष्टि कर दी थी। जब ब्रह्मा ने भगवान् कृष्ण की इस योगशक्ति को देखा तो उन्होंने हार मान ली और भगवान् को अपना स्वामी तथा सृष्टि की प्रत्येक वस्तु का द्रष्टा एवं समस्त जीवों के भीतर स्थित परमात्मा के रूप में सम्बोधित करते हुए उनकी स्तुति की। भगवान् कृष्ण नारायण हैं अर्थात् ब्रह्मा के पिता हैं क्योंकि कृष्ण के अंश रूप गर्भोदकशायी विष्णु ने गर्भोदक में शयन करते हुए ब्रह्मा को अपने शरीर से उत्पन्न किया था। कारणार्णव में महाविष्णु और सबों के हृदय में वास करनेवाले परमात्मा स्वरूप क्षीरोदकशायी विष्णु भी परम सत्य के अंश हैं।”
श्रील सनातन गोस्वामी ने इस श्लोक की टीका करते हुए भगवान् के आदि स्वरूप श्रीकृष्ण के अवतार विष्णु या नारायण के अंश की विस्तृत व्याख्या की है। इसका सार यह है कि यद्यपि ब्रह्माजी नारायण से उत्पन्न हुए थे किन्तु अब ब्रह्मा समझ रहे हैं कि नारायण तो आदि भगवान् श्रीकृष्ण के ही अंश हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥