श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 16

 
श्लोक
अत्रैव मायाधमनावतारे
ह्यस्य प्रपञ्चस्य बहि: स्फुटस्य ।
कृत्‍स्‍नस्य चान्तर्जठरे जनन्या
मायात्वमेव प्रकटीकृतं ते ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
अत्र—इसी; एव—ही; माया-धमन—हे माया को वश में करने वाले; अवतारे—अवतार में; हि—निश्चय ही; अस्य—इस; प्रपञ्चस्य—सृजित जगत का; बहि:—बाहर से; स्फुटस्य—दृश्य; कृत्स्नस्य—सम्पूर्ण; च—तथा; अन्त:—भीतर; जठरे— आपके उदर में; जनन्या:—आपकी माता के; मायात्वम्—आपकी मायावी शक्ति; एव—निस्सन्देह; प्रकटी-कृतम्—प्रकट की जा चुकी है; ते—आपके द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, आपने इसी अवतार में यह सिद्ध कर दिया है कि आप माया के परम नियंत्रक हैं। यद्यपि आप अब इस ब्रह्माण्ड के भीतर हैं किन्तु सारा ब्रह्माण्ड आपके दिव्य शरीर के भीतर है—आपने इस तथ्य को माता यशोदा के समक्ष अपने उदर के भीतर ब्रह्माण्ड दिखलाकर प्रदर्शित कर दिया है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर ब्रह्माजी भगवान् की अचिन्त्य आध्यात्मिक शक्ति का वर्णन कर रहे हैं। हम घर के भीतर घट को तो देखते हैं किन्तु इसी घट के भीतर घर के होने की अपेक्षा नहीं करते। किन्तु भगवान् इस ब्रह्माण्ड के भीतर प्रकट होकर अपने शरीर के भीतर समस्त ब्रह्माण्डों को प्रदर्शित कर सकते हैं। कोई यह तर्क कर सकता है कि चूँकि माता यशोदा ने भगवान् कृष्ण के उदर के भीतर जो ब्रह्माण्ड देखे थे वे उनके शरीर के भीतर
ही थे अतएव वे बाह्य रूप से प्रकट मायामय भौतिक ब्रह्माण्डों से भिन्न हैं। किन्तु ब्रह्माजी उस तर्क का निराकरण करते हैं । भगवान् कृष्ण मायाधमन हैं— माया के परम नियन्ता हैं। भगवान् अपनी परम योगशक्ति से साक्षात् माया को मोहित कर सकते हैं। इस तरह भगवान् ने अपने शरीर के भीतर सचमुच ही सारे भौतिक ब्रह्माण्डों को प्रदर्शित किया। यह मायात्वम् है—भगवान् की चकित कर देने वाली परम शक्ति।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥