श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 17

 
श्लोक
यस्य कुक्षाविदं सर्वं सात्मं भाति यथा तथा ।
तत्त्वय्यपीह तत् सर्वं किमिदं मायया विना ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसके; कुक्षौ—उदर में; इदम्—यह विराट जगत; सर्वम्—सारा; स-आत्मम्—अपने समेत; भाति—प्रकट किया जाता है; यथा—जिस तरह; तथा—उसी तरह; तत्—वह; त्वयि—तुम में; अपि—यद्यपि; इह—बाह्य रूप से यहाँ; तत्—वह विराट जगत; सर्वम्—सम्पूर्ण; किम्—क्या; इदम्—यह; मायया—आपकी अचिन्त्य शक्ति के प्रभाव के; विना—बिना ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह आप समेत यह सारा ब्रह्माण्ड आपके उदर में प्रदर्शित किया गया था उसी तरह अब यह उसी रूप में यहाँ पर प्रकट हुआ है। आपकी अचिन्त्य शक्ति की व्यवस्था के बिना भला ऐसा कैसे घटित हो सकता है?
 
तात्पर्य
 श्रील प्रभुपाद ने “भगवान् श्रीकृष्ण” में इस श्लोक की टीका इस प्रकार की है, “इसमें ब्रह्मा ने बल दिया है कि पूर्ण पुरुषोत्तम
भगवान् की अचिन्त्य शक्ति को स्वीकार किये बिना वस्तुओं की, वे जिस रूप में हैं, व्याख्या नहीं की जा सकती।”
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥