श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 21

 
श्लोक
को वेत्ति भूमन् भगवन् परात्मन्
योगेश्वरोतीर्भवतस्त्रिलोक्याम् ।
क्‍व वा कथं वा कति वा कदेति
विस्तारयन्क्रीडसि योगमायाम् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
क:—कौन; वेत्ति—जानता है; भूमन्—हे विराट; भगवन्—भगवान्; पर-आत्मन्—हे परमात्मा; योग-ईश्वर—हे योग के स्वामी; ऊती:—लीलाएँ; भवत:—आपकी; त्रि-लोक्याम्—तीनों लोकों में; क्व—कहाँ; वा—अथवा; कथम्—कैसे; वा— अथवा; कति—कितने; वा—अथवा; कदा—कब; इति—इस प्रकार; विस्तारयन्—विस्तार करते हुए; क्रीडसि—खेलते हो; योग-मायाम्—अपनी आध्यात्मिक शक्ति से ।.
 
अनुवाद
 
 हे भूमन, हे भगवन्, हे परमात्मा, हे योगेश्वर, आपकी लीलाएँ इन तीनों लोकों में निरन्तर चलती रहती हैं किन्तु इसका अनुमान कौन लगा सकता है कि आप कहाँ, कैसे और कब अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रयोग कर रहे हैं और इन असंख्य लीलाओं को सम्पन्न कर रहे हैं? इस रहस्य को कोई नहीं समझ सकता कि आपकी आध्यात्मिक शक्ति किस प्रकार से कार्य करती है।
 
तात्पर्य
 इसके पूर्व ब्रह्माजी कह चुके हैं कि भगवान् कृष्ण देवताओं, मनुष्यों, पशुओं, इत्यादि के बीच अवतरित होते हैं। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि अपने अवतारों से भगवान् निरादृत होते हैं। जैसाकि ब्रह्माजी यहाँ पर स्पष्ट करते हैं भगवान् के कार्यकलापों की दिव्य प्रकृति को कोई भी नहीं समझ सकता क्योंकि ये उनकी आध्यात्मिक शक्ति द्वारा सम्पन्न होते हैं। वे भूमन् होते हुए भी परम सुन्दर व्यक्ति हैं अर्थात् तिसपर भी वे भगवान् ही हैं, जो अपने धाम में प्रेममयी लीलाएँ करते रहते हैं। इसके साथ ही वे परमात्मा हैं, जो सारे बद्धजीवों के कार्यकलापों की अनुमति देते हैं और उनके साक्षी हैं। योगेश्वर शब्द से भगवान् की विविध पहचान होती है। परम सत्य समस्त योगशक्तियों के स्वामी हैं। यद्यपि वे एक हैं तथा सर्वोच्च होते हुए भी वे विविध प्रकारों से अपनी महानता तथा ऐश्वर्य प्रदर्शित करते हैं।
ऐसे उच्च आध्यात्मिक विषयों को तुच्छ भौतिक शरीर से स्वयं की पहचान करनेवाले मूर्ख व्यक्ति मुश्किल से समझ पायेंगे। ऐसे बद्धजीव, यथा नास्तिक विज्ञानी अपनी गर्वित बुद्धि को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। माया में दृढ़ विश्वास करने के कारण वे प्रकृति के गुणों में फँस जाते हैं और ईश-ज्ञान से दूर धकेल दिए जाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥