श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 23

 
श्लोक
एकस्त्वमात्मा पुरुष: पुराण:
सत्य: स्वयंज्योतिरनन्त आद्य: ।
नित्योऽक्षरोऽजस्रसुखो निरञ्जन:
पूर्णाद्वयो मुक्त उपाधितोऽमृत: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
एक:—एक; त्वम्—तुम; आत्मा—परमात्मा; पुरुष:—परम पुरुष; पुराण:—सबसे पुराना; सत्य:—परम सत्य; स्वयम्- ज्योति:—स्वत: प्रकट; अनन्त:—अन्तहीन; आद्य:—अनादि; नित्य:—शाश्वत; अक्षर:—अनश्वर; अजस्र-सुख:—जिसके सुख में व्यवधान नहीं डाला जा सकता; निरञ्जन:—कल्मषरहित; पूर्ण—पूर्ण; अद्वय:—अद्वितीय; मुक्त:—स्वतंत्र, मुक्त; उपाधित:— सारी भौतिक उपाधियों से; अमृत:—मृत्युरहित, अमर ।.
 
अनुवाद
 
 आप ही परमात्मा, आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, परम सत्य, स्वयंप्रकट, अनन्त तथा अनादि हैं। आप शाश्वत तथा अच्युत, पूर्ण, अद्वितीय तथा समस्त भौतिक उपाधियों से मुक्त हैं। न तो आपके सुख को रोका जा सकता है, न ही आपका भौतिक कल्मष से कोई नाता है। आप विनाशरहित और अमृत हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील श्रीधर स्वामी ने बतलाया है कि इस श्लोक के विविध शब्द इस बात के द्योतक हैं कि भगवान् कृष्ण का शरीर भौतिक शरीरों के गुणों से सर्वथा स्वतंत्र है। सारे भौतिक शरीरों में छह परिवर्तन होते हैं—जन्म, वृद्धि, प्रौढ़ता, प्रजनन, ह्रास तथा विनाश। किन्तु भगवान् कृष्ण जन्म नहीं लेते क्योंकि वे आदि सत्य हैं जैसाकि आद्य शब्द से पुष्ट होता है। हम विशेष वातावरण के अन्तर्गत जन्म लेते हैं और हमारे शरीर विभिन्न भौतिक तत्त्वों के मिश्रणों से बने होते हैं। चूँकि भगवान् कृष्ण किसी भौतिक वायुमण्डल या किसी तत्त्व की सृष्टि के बहुत पहले से विद्यमान हैं अतएव उनके दिव्य शरीर के लिए जन्म लेने का प्रश्न ही नहीं उठता।
इसी तरह पूर्ण शब्द इस धारणा का निराकरण करता है कि कृष्ण इसीलिए बढ़ सके क्योंकि वे सदैव पूर्णता को प्राप्त रहते हैं। जब मनुष्य का शरीर प्रौढ़ हो जाता है, तो वह युवावस्था जैसा आनन्द भोग नहीं कर सकता लेकिन अजस्र सुख शब्द जिनका अर्थ है “निरंतर सुख को भोगने वाला,” सूचित करते हैं कि भगवान् कृष्ण का शरीर कभी भी तथाकथित मध्यावस्था को प्राप्त नहीं होता है क्योंकि वह सदैव दिव्य तरुणाई के आनन्द से पूर्ण रहता है। अक्षर शब्द कृष्ण के शरीर के वृद्ध होने या उसके ह्रास की संभावना का निराकरण करानेवाला है। इसी तरह अमृत शब्द मृत्यु की सम्भावना का निषेध करता है।

दूसरे शब्दों में, कृष्ण का दिव्य शरीर भौतिक शरीरों के रूपान्तरों (विकारों) से मुक्त है। किन्तु भगवान् असंख्य जगतों की सृष्टि करते हैं और असंख्य जीवों के रूप में अपना विस्तार करते हैं। तो भी भगवान् का यह प्रजनन पूर्णतया आध्यात्मिक है।

भगवान् ने श्रुति में कहा है—पूर्वमेवाहमिहासम्—प्रारम्भ में केवल मैं ही था। इसीलिए यहाँ पर भगवान् को पुरुष:पुराण: कहा गया है। आदि पुरुष अपना विस्तार परमात्मा के रूप में करता है और प्रत्येक जीव में प्रवेश कर जाता है। तो भी अन्तत: वह परम सत्य या कृष्ण रहता है जैसाकि गोपाल तापनी उपनिषद् में कहा गया है—य: साक्षात् परब्रह्मेति गोविन्दं सच्चिदानन्दविग्रहं वृन्दावनसुरभूरुहतलासीनम्—परम सत्य साक्षात् गोविन्द हैं, जो सच्चिदानन्द विग्रह हैं और वृन्दावन के कल्पवृक्ष की छाया में बैठे हुए हैं। यह परम सत्य भौतिक अज्ञान से परे है और सामान्य आध्यात्मिक ज्ञान से भी परे है जैसाकि गोपाल तापनी श्रुति में ही कहा गया है—विद्याविद्याभ्यां भिन्न:। इस तरह वैदिक साहित्य में भगवान् कृष्ण की श्रेष्ठता अनेक प्रकार से स्थापित की जा चुकी है और यहाँ पर ब्रह्माजी द्वारा उसी की पुष्टि हुई है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥