श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 24

 
श्लोक
एवंविधं त्वां सकलात्मनामपि
स्वात्मानमात्मात्मतया विचक्षते ।
गुर्वर्कलब्धोपनिषत्सुचक्षुषा
ये ते तरन्तीव भवानृताम्बुधिम् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्-विधम्—इस प्रकार वर्णित; त्वाम्—तुमको; सकल—सभी; आत्मनाम्—आत्माओं के; अपि—निस्सन्देह; स्व- आत्मानम्—आत्मा; आत्म-आत्मतया—परमात्मा के रूप में; विचक्षते—देखते हैं; गुरु—गुरु से; अर्क—जो सूर्य के समान है; लब्ध—प्राप्त; उपनिषत्—गुह्य ज्ञान का; सु-चक्षुषा—पूर्ण आँख से; ये—जो; ते—वे; तरन्ति—पार करते हैं; इव—सरलता से; भव—संसार; अनृत—जो सच नहीं है; अम्बुधिम्—सागर को ।.
 
अनुवाद
 
 जिन्होंने सूर्य जैसे आध्यात्मिक गुरु से ज्ञान की स्पष्ट दृष्टि प्राप्त कर ली है वे आपको समस्त आत्माओं की आत्मा तथा हर एक के परमात्मा के रूप में देख सकते हैं। इस तरह आपको आदि पुरुषस्वरूप समझकर वे मायारूपी भव-सागर को पार कर सकते हैं।
 
तात्पर्य
 जैसी कि भगवद्गीता (४.९) में पुष्टि की गई है—
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

“जो मेरे प्राकट्य तथा कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानता है, वह शरीर-त्याग के बाद इस भौतिक जगत में पुन: जन्म नहीं लेता, अपितु हे अर्जुन! वह मेरे धाम को प्राप्त होता है।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥