श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 28

 
श्लोक
अन्तर्भवेऽनन्त भवन्तमेव
ह्यतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्त: ।
असन्तमप्यन्त्यहिमन्तरेण
सन्तं गुणं तं किमु यन्ति सन्त: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
अन्त:-भवे—शरीर के भीतर; अनन्त—हे अनन्त प्रभु; भवन्तम्—आप; एव—निस्सन्देह; हि—निश्चय ही; अतत्—आपसे पृथक् हर वस्तु; त्यजन्त:—त्याग करते हुए; मृगयन्ति—खोज करते हैं; सन्त:—सन्त भक्तगण; असन्तम्—अवास्तविक असत्; अपि—भी; अन्ति—पास ही उपस्थित; अहिम्—(भ्रम के) सर्प को; अन्तरेण—के बिना; सन्तम्—असली; गुणम्—रस्सी को; तम्—उस; किम् उ—क्या; यन्ति—जानते हैं; सन्त:—आध्यात्मिक पद को प्राप्त व्यक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 हे अनन्त भगवान्, सन्तजन आपसे भिन्न हर वस्तु का तिरस्कार करते हुए अपने ही शरीर के भीतर आपको खोज निकालते हैं। निस्सन्देह, विभेद करनेवाले व्यक्ति भला किस तरह अपने समक्ष पड़ी हुई रस्सी की असली प्रकृति को जान सकते हैं जब तक वे इस भ्रम का निराकरण नहीं कर लेते कि यह सर्प है?
 
तात्पर्य
 कोई तर्क कर सकता है कि मनुष्य को चाहिए कि आत्म-साक्षात्कार का अनुशीलन करने के साथ ही साथ वह भौतिक शरीर के लिए इन्द्रियतृप्ति में लगा रहे। इसका निराकरण यहाँ पर रस्सी को सर्प समझने के दृष्टांत द्वारा किया गया है। भ्रमवश रस्सी को सर्प समझनेवाला व्यक्ति भयभीत हो उठता है और तथाकथित सर्प के विषय में सोचता है। किन्तु यह पता चल जाने पर कि तथाकथित सर्प वास्तव में रस्सी है उसे भिन्न भाव—राहत—का अनुभव होता है और तब वह रस्सी के प्रति उदासीन हो जाता है। इसी तरह चूँकि हम भौतिक शरीर को भ्रमवश ‘स्व’ मान लेते हैं अतएव शरीर को ले कर अनेक भावों की हमें अनुभूति होती है। किन्तु यह पता चलने पर कि यह शरीर भौतिक रसायनों की पोटली मात्र है हम ध्यानपूर्वक सोचते हैं कि यह भ्रम किस तरह उत्पन्न हुआ और तब शरीर के प्रति हमारी रुचि नहीं रह जाती। यह जान लेने पर कि हम शरीर के भीतर शाश्वत आत्मा हैं यह स्वाभाविक है कि हम अपना ध्यान असली आत्मा पर एकाग्र करते हैं।
जो लोग सन्त स्वभाव के तथा बुद्धिमान हैं, वे सदैव आध्यात्मिक ज्ञान अर्थात् कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करते हैं क्योंकि वे शरीर को ‘स्व’ मानने की मूर्खतापूर्ण गलत पहचान को त्याग चुके होते हैं। ऐसे कृष्णभावनाभावित व्यक्तियों को शरीर के भीतर परमात्मा रूप में वास करनेवाले भगवान् की अनुभूति होती है, जो प्रत्येक जीव का साक्षी एवं मार्गदर्शक है। परमात्मा तथा आत्मा की अनुभूति इतनी सुखद तथा सन्तोषप्रद होती है कि सिद्ध व्यक्ति उन सारी बातों को स्वयमेव छोड़ देता है, जो उसकी आध्यात्मिक प्रगति से सम्बन्ध नहीं रखती।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥