श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 38

 
श्लोक
जानन्त एव जानन्तु किं बहूक्त्या न मे प्रभो ।
मनसो वपुषो वाचो वैभवं तव गोचर: ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
जानन्त:—ऐसे व्यक्ति जो सोचते हैं कि वे आपकी असीम शक्ति से अवगत हैं; एव—निश्चय ही; जानन्तु—ऐसा सोचा करें; किम्—क्या लाभ; बहु-उक्त्या—अनेक वचनों से; न—नहीं; मे—मेरे; प्रभो—हे स्वामी; मनस:—मन का; वपुष:—शरीर का; वाच:—वाणी का; वैभवम्—ऐश्वर्य; तव—आपकी; गो-चर:—परिधि में ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसे लोग भी हैं, जो यह कहते हैं कि वे कृष्ण के विषय में सब कुछ जानते हैं—वे ऐसा सोचा करें। किन्तु जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं इस विषय में कुछ अधिक नहीं कहना चाहता। हे प्रभु, मैं तो इतना ही कहूँगा कि जहाँ तक आपके ऐश्वर्यों की बात है वे मेरे मन, शरीर तथा शब्दों की पहुँच से बाहर हैं।
 
तात्पर्य
 उक्त कथन श्रील प्रभुपाद कृत चैतन्य-चरितामृत
(मध्य-लीला २१.२७) से उद्धृत है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥