श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 42

 
श्लोक
ततोऽनुज्ञाप्य भगवान् स्वभुवं प्रागवस्थितान् ।
वत्सान् पुलिनमानिन्ये यथापूर्वसखं स्वकम् ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तब; अनुज्ञाप्य—अनुमति देकर; भगवान्—भगवान्; स्व-भुवम्—अपने पुत्र (ब्रह्मा) को; प्राक्—पहले से; अवस्थितान्—स्थित; वत्सान्—बछड़े; पुलिनम्—नदी के तट पर; आनिन्ये—ले आये; यथा-पूर्व—पहले की तरह; सखम्— जहाँ पर मित्रगण उपस्थित थे; स्वकम्—अपने ।.
 
अनुवाद
 
 अपने पुत्र ब्रह्मा को प्रस्थान की अनुमति देकर भगवान् ने बछड़ों को साथ ले लिया, जो अब भी वहीं थे जहाँ वे एक वर्ष पूर्व थे और उन्हें नदी के तट पर ले आये जहाँ पर भगवान् स्वयं पहले भोजन कर रहे थे और जहाँ पर उनके ग्वालबाल मित्र पूर्ववत् थे।
 
तात्पर्य
 स्व-भुवम् शब्द, जिसका अर्थ है “अपने पुत्र को,” सूचित करता है कि भगवान् कृष्ण ने ब्रह्मा द्वारा किये अपराध को क्षमा कर दिया था और उसे अब अपने पुत्र के समान स्नेह कर रहे थे। इस श्लोक में यह कहा गया है कि असली ग्वालबाल सखा तथा बछड़े पूर्ववत् यमुना तट पर तथा जंगल में थे। इससे पूर्व बछड़े जंगल में खो गये थे और कृष्ण उन्हें ढूँढऩे गये थे। उन्हें न पाकर वे अपने ग्वाल मित्रों से स्थिति पर विचारविमर्श करने लौट आये थे किन्तु वे भी वहाँ से लुप्त हो चुके थे। अब पुन: गौवें जंगल में थीं और भोजन करने के लिए ग्वालबाल नदी के तट पर थे। श्रील सनातन गोस्वामी के अनुसार बछड़े तथा ग्वालबाल क्रमश: जंगल तथा नदी तट पर एक साल तक रहते रहे। ब्रह्माजी वास्तव में उन्हें किसी अन्य स्थान पर नहीं ले गये। भगवान् की सर्वशक्तियुत माया से गोपियों तथा वृन्दावन के अन्य वासियों ने न तो बछड़ों तथा बालकों की ओर ध्यान दिया, न ही बछड़ों तथा बच्चों ने एक वर्ष की अवधि गुजरते देखी या भूख, प्यास अथवा ठंड का अनुभव किया। भगवान् की माया द्वारा ये सारी लीलाएँ नियोजित थीं। ब्रह्मा ने सोचा, “मैंने गोकुल के सारे बालकों तथा बछड़ों को अपनी योगशक्ति की शय्या पर सुला रखा है और वे सब आज तक नहीं जगे हैं। उतनी ही संख्या में बालक तथा बछड़े पूरे वर्ष भर भगवान् कृष्ण के साथ खेलते रहे हैं किन्तु जिन्हें मैंने योगशक्ति द्वारा मोहित किया है उनसे ये भिन्न हैं। तो फिर वे कौन हैं? वे कहाँ से आये?”
भगवान् से कुछ भी अदृश्य नहीं है। इसीलिए भगवान् कृष्ण बछड़ों तथा बालकों को खोजते हुए ब्रह्मा को मोहित करने की नाटकीय लीला का स्वाँग कर रहे थे। जब ब्रह्मा स्तुति कर चुके तो कृष्ण असली बालकों तथा बछड़ों के पास लौट आये जो बिल्कुल पहले की ही तरह लग रहे थे यद्यपि एक वर्ष की अवधि बीतने के कारण उनके कद में कुछ वृद्धि हो गई थी।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार चूँकि कृष्ण वृन्दावन में भोले-भाले किशोर ग्वालबाल की क्रीड़ा कर रहे थे अत: जब चतुर्मुख ब्रह्मा स्तुति कर चुके तो कृष्ण उनके समक्ष मौन बने रहे। कृष्ण की चुप्पी से निम्नलिखित भाव इंगित होते हैं—“ये चतुर्मुख ब्रह्मा कहाँ से आये? वे क्या कर रहे हैं? वे क्या बोले चले जा रहे हैं? मैं तो अपने बछड़ों की खोज करने में व्यस्त हूँ। मैं तो ग्वालबाल ठहरा। मैं यह सब क्या समझूँ।” ब्रह्मा ने कृष्ण को सामान्य ग्वालबाल समझकर उनके साथ व्यवहार किया था। ब्रह्मा की स्तुति स्वीकार करने के बाद कृष्ण ग्वालबाल की तरह खेलते रहे। उन्होंने चतुर्मुख ब्रह्मा को कोई उत्तर नहीं दिया। कृष्ण को अपने ग्वालबाल मित्रों से मिलने और यमुना नदी के तट पर भोजन करने की अधिक चिन्ता थी।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥