श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 50

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
सर्वेषामपि भूतानां नृप स्वात्मैव वल्लभ: ।
इतरेऽपत्यवित्ताद्यास्तद्वल्लभतयैव हि ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सर्वेषाम्—समस्त; अपि—निस्सन्देह; भूतानाम्—जीवों में; नृप—हे राजन्; स्व-आत्मा—अपनी ही आत्मा, स्व; एव—निश्चय ही; वल्लभ:—प्रियतम; इतरे—अन्य; अपत्य—सन्तानें; वित्त—धन; आद्या:—इत्यादि; तत्—उस आत्मा के; वल्लभतया—प्रियत्व पर आश्रित; एव हि—निस्सन्देह ।.
 
अनुवाद
 
 श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्, प्रत्येक प्राणी के लिए स्वयं ही सर्वाधिक प्रिय होता है। सन्तान, धन इत्यादि अन्य समस्त वस्तुओं की प्रियता केवल आत्म-प्रियता के कारण है।
 
तात्पर्य
 कभी कभी आधुनिक चिन्तक नैतिक आचरण के मनोविज्ञान का अध्ययन करते समय चकरा जाते हैं। जैसाकि यहाँ पर बतलाया गया है, कि प्रत्येक जीव आत्म-रक्षण के प्रति उन्मुख रहता है किन्तु कभी-कभी कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ की बलि—यथा अन्यों के लाभ के लिए अपना धन देकर या राष्ट्रीय हित के लिए अपना जीवन देकर—स्वेच्छा से कर देता है। ऐसा तथाकथित निस्वार्थ आचरण भौतिक आत्म-केन्द्रता तथा आत्म-रक्षण के सिद्धान्त का विरोधी प्रतीत होता है। किन्तु जैसाकि इस श्लोक में बतलाया गया है जीव अपने समाज, राष्ट्र, परिवार इत्यादि की सेवा इसीलिए करता है क्योंकि ये प्रिय वस्तुएँ मिथ्या अहंकार की विस्तारित
विचारधारा को ही प्रदर्शित करने वाली हैं। देशभक्त अपने को महान् राष्ट्र के महान् सेवक के रूप में देखता है अतएव वह अपने अहंभाव की तुष्टि के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर देता है। इसी तरह यह सुपरिचित तथ्य है कि मनुष्य अपनी पत्नी तथा अपनी सन्तान को प्रसन्न करने के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है। अपने को अपने परिवार तथा अपनी जाति के निस्वार्थ शुभचिन्तक के रूप में देखते हुए मनुष्य को परम अहमन्यता का सुख प्राप्त होता है। ऐसा विरोधमूलक आचरण भौतिक जीवन के माया-मोह का अन्य प्रत्यक्ष प्रमाण है, जो अलौकिक आत्मा के निपट अज्ञान की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥