श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 53

 
श्लोक
देहोऽपि ममताभाक् चेत्तर्ह्यसौ नात्मवत् प्रिय: ।
यज्जीर्यत्यपि देहेऽस्मिन् जीविताशा बलीयसी ॥ ५३ ॥
 
शब्दार्थ
देह:—शरीर; अपि—भी; ममता—स्वामित्व का; भाक्—केन्द्रबिन्दु; चेत्—यदि; तर्हि—तब; असौ—वह शरीर; न—नहीं; आत्म-वत्—आत्मा के समान; प्रिय:—प्रिय; यत्—क्योंकि; जीर्यति—वृद्ध होते हुए; अपि—भी; देहे—शरीर में; अस्मिन्— इस; जीवित-आशा—जीवित रहने की आकांक्षा; बलीयसी—अत्यन्त प्रबल ।.
 
अनुवाद
 
 यदि मनुष्य शरीर को “मैं” न मानकर “मेरा” मानने की अवस्था तक पहुँच जाता है, तो वह निश्चित रूप से शरीर को अपने आप जितना प्रिय नहीं मानेगा। यही कारण है कि शरीर के जीर्णशीर्ण हो जाने पर भी जीवित रहते जाने की आशा प्रबल रहती है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर ममताभाक् शब्द अत्यन्त सार्थक है। सामान्य मूर्ख व्यक्ति सोचता है कि “मैं यह शरीर हूँ।” किन्तु अधिक विवेकवान बुद्धिमान व्यक्ति सोचता है कि “यह मेरा शरीर है।” साहित्य में तथा सामान्य लोगों की लोक-कथाओं में वृद्ध एवं जर्जर व्यक्ति में एक नया तरुण शरीर प्राप्त करने की अभिलाषा सामान्यतया पायी जाती है। इस तरह सामान्य व्यक्तियों तक में आत्म-साक्षात्कार का विचार पैदा हो जाता है और वे सहजभाव से समझते हैं कि अनेक शरीरों में आत्मा के लिए रह पाना सम्भव है।
बुद्धिमान व्यक्ति का शरीर ज्यों ज्यों जीर्णशीर्ण होता जाता है उसमें जीवित रहने की आकांक्षा बलवती होती जाती है, यद्यपि वह यह जानता रहता है कि उसका शरीर अधिक काल तक चल नहीं सकता। इससे यह सूचित होता है कि धीरे धीरे वह इस तथ्य से अवगत होता जाता है कि इस शरीर की तुलना में उसकी आत्मा अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस तरह जीविताशा से मनुष्य अप्रत्यक्षत: आत्म- साक्षात्कार की प्रारम्भिक जानकारी की ओर जाने लगता है। मनुष्य की मूलभूत आसक्ति अपनी आत्मा से रहती है, अपने से सम्बद्ध वस्तुओं से नहीं।

यहाँ यह इंगित कर दिया जाय कि राजा परीक्षित तथा शुकदेव गोस्वामी के बीच आत्मा के प्रियत्व को लेकर होनेवाला समूचा संवाद इस विषय को छेडऩा है कि वृन्दावन की गौवें तथा गोपियाँ कृष्ण को अपने आप से भी अधिक प्रिय, यहाँ तक कि अपनी सन्तानों से भी अधिक प्रिय क्यों मानती थीं। यह संवाद आगे बढ़ता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥