श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 14: ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति  »  श्लोक 60

 
श्लोक
एतत् सुहृद्भ‍िश्चरितं मुरारे-
रघार्दनं शाद्वलजेमनं च ।
व्यक्तेतरद् रूपमजोर्वभिष्टवं
श‍ृण्वन् गृणन्नेति नरोऽखिलार्थान् ॥ ६० ॥
 
शब्दार्थ
एतत्—ये; सुहृद्भि:—अपने ग्वाल मित्रों के साथ; चरितम्—लीलाएँ; मुरारे:—भगवान् मुरारी की; अघ-अर्दनम्—अघासुर का दमन; शाद्वल—जंगल की घास पर; जेमनम्—भोजन करते हुए; च—तथा; व्यक्त-इतरत्—अलौकिक; रूपम्—भगवान् का दिव्य रूप; अज—ब्रह्मा द्वारा; उरु—विस्तृत; अभिष्टवम्—स्तुति; शृण्वन्—श्रवण; गृणन्—कीर्तन; एति—प्राप्त करता है; नर:—कोई मनुष्य; अखिल-अर्थान्—सारी मनवांछित वस्तुएँ ।.
 
अनुवाद
 
 मुरारी द्वारा ग्वालबालों के साथ सम्पन्न इन लीलाओं को—यथा अघासुर वध, जंगल की घास पर बैठकर भोजन करना, भगवान् द्वारा दिव्य रूपों का प्राकट्य तथा ब्रह्मा द्वारा की गई अद्भुत स्तुति को जो भी व्यक्ति सुनता है या उनका कीर्तन करता है उसकी सारी आध्यात्मिक मनोकामनाएँ अवश्य पूरी होती हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील सनातन गोस्वामी के अनुसार भगवान् कृष्ण की लीलाओं को सुनने तथा उनका कीर्तन करने के प्रति मात्र प्रवृत्ति रखनेवाला व्यक्ति भी आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त करेगा। कृष्णभावनामृत के प्रचार-प्रसार में तन्मयता से लगे बहुत से भक्तगण प्राय: इतने व्यस्त रहते हैं
कि वे जी भरकर भगवान् की लीलाओं का कीर्तन तथा श्रवण नहीं कर पाते। किन्तु केवल भगवान् कृष्ण का सदैव कीर्तन एवं श्रवण करने की प्रबल इच्छा के कारण वे आध्यात्मिक सिद्धि लाभ करेंगे। किन्तु जहाँ तक सम्भव हो, भगवान् की इन दिव्य लीलाओं का वास्तविक उच्चारण करना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥