श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 15: धेनुकासुर का वध  »  श्लोक 35

 
श्लोक
नैतच्चित्रं भगवति ह्यनन्ते जगदीश्वरे ।
ओतप्रोतमिदं यस्मिंस्तन्तुष्वङ्ग यथा पट: ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; एतत्—यह; चित्रम्—आश्चर्यजनक; भगवति—भगवान् के लिए; हि—निस्सन्देह; अनन्ते—अनन्त; जगत्-ईश्वरे— ब्रह्माण्ड के स्वामी; ओत-प्रोतम्—ऊपर नीचे फैला हुआ (ताना बाना); इदम्—यह ब्रह्माण्ड; यस्मिन्—जिसमें; तन्तुषु—इसके धागों पर; अङ्ग—हे परीक्षित; यथा—जिस तरह ।.
 
अनुवाद
 
 हे परीक्षित, बलराम को अनन्त भगवान् एवं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का नियन्ता जान लेने पर बलराम द्वारा धेनुकासुर का मारा जाना उतना आश्चर्यजनक नहीं है। निस्सन्देह, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उन पर उसी प्रकार टिका है, जिस तरह बुना हुआ वस्त्र तानों-बानों पर टिका रहता है।
 
तात्पर्य
 अभागे व्यक्ति भगवान् की आनन्दमय लीलाओं को नहीं समझ सकते। इस प्रसंग में, श्रील जीव गोस्वामी बतलाते हैं कि भगवान् में असीम शक्ति है जैसाकि अनन्ते शब्द से प्रकट है। भगवान् विशेष अवसर की आवश्यकता के अनुसार अपनी शक्ति के एक
सूक्ष्म अंश का प्रदर्शन करते हैं। बलराम जी ने तालवन में अवैध रूप से कब्जा करने वाले आसुरी गधों के झुंड को विनष्ट करना चाहा। अत: उन्होंने धेनुकासुर तथा अन्य असुरों को सहज ही मार डालने भर की दिव्य शक्ति का प्रदर्शन किया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥